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रेडियो-टीवी की फंडिंग बदलने पर घिरी चेक सरकार
प्राग: चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में सार्वजनिक रेडियो और टेलीविजन की फंडिंग व्यवस्था बदलने की सरकारी योजना के खिलाफ रविवार, 25 अक्टूबर को हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री आंद्रे बाबिश की सरकार के प्रस्ताव का विरोध कर रहे लोगों ने इसे मीडिया की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि सरकार मसौदा वापस ले और किसी बड़े बदलाव से पहले व्यापक सार्वजनिक चर्चा कराए। ऐतिहासिक ओल्ड टाउन स्क्वायर में जुटी भीड़ आसपास की सड़कों तक फैल गई।
विरोध का मुख्य मुद्दा चेक टेलीविजन और चेक रेडियो के वित्तपोषण का तरीका है। प्रस्ताव के तहत नागरिकों, परिवारों और कारोबारों से मिलने वाले नियमित प्रसारण शुल्क की व्यवस्था खत्म कर इन संस्थानों को सीधे सरकारी बजट से धन उपलब्ध कराया जाएगा। आलोचकों को आशंका है कि इससे सार्वजनिक प्रसारक सरकार के वित्तीय फैसलों पर अधिक निर्भर हो जाएंगे। उनका कहना है कि बजट आवंटन पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ने से संपादकीय निर्णयों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, सरकार इस आशंका को खारिज करती है।
संसद में मसौदे को आगे बढ़ाने के तरीके ने भी नाराजगी बढ़ाई है। सत्तारूढ़ गठबंधन ने शनिवार तड़के हुई मतदान प्रक्रिया में प्रस्ताव को शुरुआती समर्थन दिया। मतदान का समय सुबह 4 बजकर 36 मिनट रखा गया था। विपक्ष को चर्चा के लिए सीमित समय मिलने पर भी सवाल उठे। प्रदर्शनकारियों ने इस समय का उल्लेख करते हुए सरकार की कार्यशैली का विरोध किया। उनका आरोप है कि सार्वजनिक महत्व के विषय पर पर्याप्त बहस किए बिना विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
प्रदर्शन का आयोजन करने वाले नागरिक समूह ‘मिलियन मोमेंट्स फॉर डेमोक्रेसी’ ने सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया। समूह के प्रमुख आयोजकों में शामिल मिकुलाश मिनार ने कहा कि नागरिक इस कदम को स्वीकार नहीं करेंगे। आयोजकों ने सार्वजनिक प्रसारकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लोगों से एकजुट रहने की अपील की। उनकी मांग है कि सरकार पहले विशेषज्ञों, पत्रकारों और नागरिकों की राय सुने तथा प्रस्ताव के संभावित प्रभावों पर खुली चर्चा कराए। प्रस्तावित बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू सार्वजनिक प्रसारकों के बजट में संभावित कटौती भी है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, नई व्यवस्था में चेक टेलीविजन और चेक रेडियो को मौजूदा स्तर की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत कम धन मिल सकता है। इसी कारण विरोध केवल शुल्क समाप्त करने तक सीमित नहीं है। प्रदर्शनकारी यह भी सवाल उठा रहे हैं कि कम संसाधनों और सरकारी आवंटन पर बढ़ती निर्भरता के बीच संस्थानों की स्वायत्तता कैसे सुरक्षित रहेगी। ये आशंकाएं प्रस्ताव के विरोध का प्रमुख आधार बनी हुई हैं।
दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि बदलाव से नागरिकों पर प्रसारण शुल्क का बोझ कम होगा और खर्च में बचत की जा सकेगी। उसका कहना है कि यूरोप के कई देशों में शुल्क आधारित व्यवस्था से हटने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। सरकार ने संपादकीय स्वतंत्रता कमजोर करने की मंशा से इनकार किया है। इस तरह दोनों पक्षों के बीच मुख्य मतभेद वित्तपोषण की नई व्यवस्था में स्वतंत्रता की गारंटी को लेकर है। सरकार इसे सुधार बता रही है, जबकि विरोधी पर्याप्त सुरक्षा प्रावधानों की मांग कर रहे हैं।
विवाद पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने भी चिंता जताई है। यूरोपीय प्रसारण संघ, यूरोपीय पत्रकार महासंघ, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स और इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट ने योजना की आलोचना की है। पत्रकार संगठनों का जोर सार्वजनिक मीडिया के लिए पर्याप्त, स्थिर और अनुमान योग्य वित्तपोषण पर है। उनका मानना है कि संस्थानों को अपनी पत्रकारिता और कार्यक्रमों की योजना बनाने के लिए आर्थिक स्थिरता चाहिए। यूरोपीय पत्रकार महासंघ ने प्रस्ताव को यूरोपीय मीडिया स्वतंत्रता कानून की वित्तपोषण संबंधी आवश्यकताओं के विरुद्ध बताया है। चेक गणराज्य के राष्ट्रपति पेत्र पावेल ने भी जल्दबाजी से बचने का संदेश दिया है। उन्होंने सार्वजनिक सेवा मीडिया को लोकतंत्र के बुनियादी स्तंभों में शामिल बताया और ऐसे कदमों के प्रति सावधानी बरतने को कहा, जिनके प्रभाव वापस लेना कठिन हो। उनकी टिप्पणी से प्रस्ताव की विशेषज्ञ समीक्षा और व्यापक विचार-विमर्श की मांग को बल मिला है। विरोधियों का कहना है कि वित्तीय बदलाव के प्रभाव केवल प्रसारकों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि नागरिकों को मिलने वाली स्वतंत्र सूचना की व्यवस्था से भी जुड़े होंगे।
सार्वजनिक मीडिया के पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों ने 3 नवंबर को हड़ताल की घोषणा की है। इसके अलावा 15 नवंबर को प्राग में एक बड़ा प्रदर्शन प्रस्तावित है। मसौदे को शुरुआती संसदीय समर्थन मिलने के बावजूद कानून बनने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। आगे की विधायी चर्चा के बीच सरकार पर विरोधियों की आपत्तियों का जवाब देने का दबाव बना रहेगा। फिलहाल प्रदर्शनकारियों की मांग स्पष्ट है कि प्रस्ताव वापस लिया जाए और सार्वजनिक प्रसारकों के भविष्य पर पर्याप्त चर्चा के बाद ही निर्णय किया जाए।
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