विश्व
दुनिया के फोन में इस्तेमाल होता कांगो का कोबाल्ट, खदानों में बच्चों की जिंदगी दांव पर
jantaserishta.com
12 Sept 2026 1:29 PM IST

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नई दिल्ली: जिस फोन को हम अपनी जिंदगी का जरूरी हिस्सा मानते हैं, उसकी बैटरी के पीछे आखिर किसकी कीमत छिपी है? क्या हमारी स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक गाड़ियों की दुनिया की चमक के पीछे बच्चों की मजबूरी भी जुड़ी है? अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो से जुड़ी कोबाल्ट माइनिंग की तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यहां कोबाल्ट की खदानों में बच्चों के काम करने और खतरनाक परिस्थितियों का सामना करने की रिपोर्ट सामने आती रही हैं।
दुनिया के कोबाल्ट का बड़ा हिस्सा कांगो से
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो कोबाल्ट की वैश्विक सप्लाई में बेहद अहम भूमिका निभाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में होने वाले कोबाल्ट उत्पादन का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा इसी देश से आता है।
कोबाल्ट एक महत्वपूर्ण खनिज है, जिसका इस्तेमाल स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाली कई रिचार्जेबल लिथियम-आयन बैटरियों में किया जाता है। यही वजह है कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक और बैटरी इंडस्ट्री के लिए कांगो का कोबाल्ट काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन इस चमकदार तकनीक के पीछे एक गंभीर मानवीय समस्या भी बताई जाती है।
खदानों में बच्चों के काम करने का दावा
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कांगो में 40 हजार से ज्यादा बच्चे कोबाल्ट की छोटी और अनौपचारिक खदानों में काम करते हैं। इनमें कुछ बच्चों की उम्र महज 6 साल तक बताई जाती है।
गरीबी से जूझ रहे परिवारों के लिए बच्चों की कमाई भी आमदनी का जरिया बन जाती है। बताया जाता है कि कई जगह बच्चे बेहद कम मजदूरी पर काम करते हैं और पूरे दिन मेहनत करने के बदले उन्हें करीब 1 से 2 डॉलर तक मिलते हैं। इन खदानों में काम करना सामान्य मजदूरी जैसा नहीं है। कई जगह सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने की बात सामने आती है।
कभी भी ढह सकती हैं संकरी सुरंगें
कोबाल्ट की अनौपचारिक खदानों में कई मजदूर संकरी सुरंगों के अंदर जाकर काम करते हैं। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कुछ सुरंगें बिना उचित सहारे के होती हैं और उनके अचानक ढहने का खतरा बना रहता है।
ऐसी स्थिति में जमीन के नीचे काम कर रहे मजदूरों के फंसने या दबने का खतरा रहता है। बच्चों के लिए यह जोखिम और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि कम उम्र में उन्हें ऐसे खतरनाक माहौल में काम करना पड़ता है।
कोबाल्ट की धूल से स्वास्थ्य पर असर
खदानों में सिर्फ दुर्घटना का खतरा ही नहीं है। बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के लगातार कोबाल्ट की धूल के संपर्क में रहने से सांस से जुड़ी परेशानियां और लंबे समय तक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका बताई गई है।
कुछ माइनिंग क्षेत्रों में यूरेनियम वाले पदार्थ पाए जाने की बात भी रिपोर्ट्स में सामने आती है। ऐसे क्षेत्रों में रेडिएशन के संपर्क का अतिरिक्त जोखिम हो सकता है।
असली कोबाल्ट की पहचान करना मुश्किल
इस पूरी कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू सप्लाई चेन है। अनौपचारिक खदानों से निकला कोबाल्ट कई बार बिचौलियों और रिफाइनरियों के जरिए आगे जाता है। वहां इसे दूसरे स्रोतों से आए कोबाल्ट के साथ मिलाए जाने की संभावना बताई जाती है। यही वजह है कि किसी बैटरी में इस्तेमाल हुए कोबाल्ट का वास्तविक स्रोत पता लगाना कई बार मुश्किल हो सकता है।
बड़ी कंपनियों के सामने भी चुनौती
कई बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां बाल मजदूरी के खिलाफ अपनी नीतियां रखती हैं। लेकिन कोबाल्ट की सप्लाई चेन कई स्तरों और अलग-अलग कारोबारियों से होकर गुजरती है। ऐसे में किसी प्रोडक्ट में इस्तेमाल होने वाले खनिज का शुरुआती स्रोत पूरी तरह ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यानी जिस बैटरी को हम आधुनिक तकनीक की ताकत मानते हैं, उसके पीछे कांगो की खदानों में काम करने वाले लोगों की जिंदगी से जुड़े गंभीर सवाल भी मौजूद हैं। कोबाल्ट की बढ़ती मांग के बीच अब चुनौती सिर्फ ज्यादा खनिज हासिल करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि उसकी सप्लाई में बच्चों का शोषण और असुरक्षित मजदूरी शामिल न हो।
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