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CHIN चीन : चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना का दूसरा चरण पाकिस्तान के लिए आसान नहीं रहने वाला है। चीन ने साफ कर दिया है कि परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए कई कड़े शर्तों को पूरा करना होगा। सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा को लेकर है। चीन के हितों पर लगातार तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) द्वारा हमले किए गए हैं। फेज-1 के दौरान भी चीन को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। बीएलए का कहना है कि पाकिस्तान सरकार इलाके के संसाधनों का दोहन तो करती है, लेकिन उसके लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंचते। इस मुद्दे पर पाकिस्तान और चीन के बीच 2 से 4 सितंबर तक बीजिंग में चल रही बैठकों में चर्चा हो रही है। चीन ने स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा गारंटी के बिना परियोजना का अगला चरण संभव नहीं है।
टीटीपी से पाकिस्तानी सेना को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है। पाकिस्तान ने इसके लिए अफगान तालिबान को जिम्मेदार ठहराया है और कहा है कि वे टीटीपी को अपनी जमीन से हमले करने की अनुमति देते हैं। हाल ही में चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हुई त्रिपक्षीय बैठक में भी यह मुद्दा उठा था। अफगानिस्तान ने बीएलए को लेकर आश्वासन दिया लेकिन टीटीपी पर कोई भरोसा नहीं दिलाया। सुरक्षा के अलावा चीन को पाकिस्तान और अमेरिका के बढ़ते रिश्तों पर भी चिंता है। बीजिंग ने इस पर सफाई मांगी है और कहा है कि पाकिस्तान को अमेरिका से अपने संबंधों की स्थिति स्पष्ट करनी होगी। इसके साथ ही पाकिस्तान के दुर्लभ खनिज भंडार (रेयर अर्थ मिनरल्स) पर भी चीन और अमेरिका दोनों की नजर है। चीन जानना चाहता है कि अमेरिका के साथ इस मामले में पाकिस्तान का क्या समझौता हुआ है और उसमें चीन की हिस्सेदारी कितनी होगी।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल इस समय बीजिंग में है, जहां वे राष्ट्रपति शी जिनपिंग, प्रधानमंत्री ली कियांग, विदेश मंत्री वांग यी और शीर्ष सैन्य अधिकारियों से मुलाकात कर रहे हैं। चीन ने पाकिस्तान को यह भी कहा है कि अफगानिस्तान तक सीपीईसी के विस्तार में वह अहम भूमिका निभाए और सुरक्षा संबंधी रोडमैप तैयार करे। बीजिंग को आशंका है कि अफगानिस्तान में मौजूद टीटीपी चीन की परियोजनाओं पर हमले कर सकता है। हालांकि चीन सीपीईसी का विस्तार चाहता है, लेकिन फेज-1 में झेले भारी नुकसान को देखते हुए वह बेहद सतर्क है। मौजूदा हालात में पाकिस्तान के लिए चीन की शर्तें पूरी करना एक कठिन चुनौती है।
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