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ताइवान के नेताओं के परिवारों पर चीन का दबाव, चुनाव में दखल की आशंका

Ratna Netam
24 Oct 2026 9:59 PM IST
ताइवान के नेताओं के परिवारों पर चीन का दबाव, चुनाव में दखल की आशंका
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ताइपे। चीन और ताइवान के बीच बढ़ते तनाव के बीच बीजिंग पर ताइवान के स्वतंत्रता समर्थक नेताओं और कार्यकर्ताओं के परिवारों को निशाना बनाने का आरोप लगा है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ऐसे राजनेताओं के रिश्तेदारों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, जिन्हें वह ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थक मानता है। इस घटनाक्रम ने ताइवान में आगामी चुनावों को प्रभावित करने की आशंकाओं को और बढ़ा दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि परिवारों और कारोबारी हितों पर दबाव डालना राजनीतिक विरोधियों को अपने रुख से पीछे हटने के लिए मजबूर करने का एक तरीका हो सकता है।‘द ताइपे टाइम्स’ की रिपोर्ट में अमेरिका स्थित इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर (ISW) और अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट (AEI) के आकलन का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग की रणनीति केवल ताइवान के नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके परिवारों और उनसे जुड़े व्यावसायिक हितों तक भी पहुंच रही है। हालांकि, इन कदमों का चुनावों पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
पूमा शेन के पिता की कंपनी पर प्रतिबंध
रिपोर्ट में ताइवान की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) के विधायक और ताइपे के मेयर पद के उम्मीदवार पूमा शेन के परिवार से जुड़ा मामला प्रमुखता से उठाया गया है। बताया गया है कि उनके पिता शेन तू-चेंग की कंपनी ‘VWAY’ पर चीन ने प्रतिबंध लगाए हैं।चीन के ताइवान अफेयर्स ऑफिस की ओर से घोषित प्रतिबंधों के तहत कंपनी को चीन के किसी भी संगठन, उद्यम या व्यक्ति के साथ व्यापार करने से रोक दिया गया है। इस कदम को ताइवान के स्वतंत्रता समर्थक नेताओं से जुड़े कारोबारी हितों पर दबाव बनाने के संभावित उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है।पूमा शेन पहले भी चीन के निशाने पर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2024 में बीजिंग ने करीब एक दर्जन लोगों की सूची जारी की थी, जिन्हें उसने ‘कट्टर अलगाववादी’ करार दिया था। इस सूची में पूमा शेन का नाम भी शामिल था। चीन ताइवान की स्वतंत्रता की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों का लगातार विरोध करता रहा है और ऐसे प्रयासों को अपने क्षेत्रीय दावों के खिलाफ मानता है।
अलगाव-विरोधी कानून के तहत सख्त सजा का प्रावधान
चीन के ‘एंटी-सेशन लॉ’ यानी अलगाव-विरोधी कानून को लेकर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग की इस कानून की व्याख्या के तहत स्वतंत्रता समर्थक माने जाने वाले कुछ लोगों को कठोर दंड का सामना करना पड़ सकता है। इसमें गंभीर मामलों में मृत्युदंड तक का प्रावधान होने की बात कही गई है।इस तरह की घोषणाओं से ताइवान के राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच चिंता बढ़ सकती है। विशेष रूप से उन लोगों के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जिनके परिवार के सदस्य चीन में रहते हैं या जिनके कारोबारी संबंध चीनी बाजार से जुड़े हुए हैं।
अन्य ताइवानी हस्तियों के परिवार भी निशाने पर
रिपोर्ट में ताइवान की अन्य सार्वजनिक हस्तियों के रिश्तेदारों से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, यूनाइटेड माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्प के संस्थापक रॉबर्ट साओ के एक भाई को इस महीने की शुरुआत में चीन में प्रवेश करने से रोक दिया गया था।एक अन्य मामले में ताइवान की गृह मंत्री लियू श्यह-फांग के भतीजे को लेकर भी दबाव बनाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध विवरण में इस मामले से संबंधित पूरी जानकारी स्पष्ट नहीं है।इन घटनाओं को व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो ताइवान और चीन के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी तनाव का असर आम नागरिकों तथा परिवारों तक पहुंचने की आशंका बढ़ती दिखाई देती है। यदि किसी नेता के रिश्तेदारों को कारोबारी प्रतिबंधों या यात्रा संबंधी पाबंदियों का सामना करना पड़ता है, तो इससे संबंधित परिवारों पर आर्थिक और सामाजिक दबाव पड़ सकता है।
चुनावों में हस्तक्षेप की आशंका बढ़ी
ताइवान में आगामी चुनावों को देखते हुए इन घटनाओं का राजनीतिक महत्व बढ़ गया है। आशंका जताई जा रही है कि चीन आर्थिक प्रतिबंधों, यात्रा संबंधी पाबंदियों और कानूनी कार्रवाई की चेतावनियों के जरिए स्वतंत्रता समर्थक नेताओं के फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है।ताइवान की राजनीति में चीन के साथ संबंध और द्वीप की स्वायत्तता लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। बीजिंग ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान में चीन के साथ संबंधों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक विचार मौजूद हैं।रिपोर्ट में सामने आए मामलों से यह सवाल उठता है कि क्या परिवारों और कारोबारी संस्थाओं पर कार्रवाई राजनीतिक दबाव का माध्यम बन रही है। हालांकि, प्रत्येक मामले के पीछे चीन की मंशा और आगामी चुनावों पर उसके संभावित प्रभाव का स्वतंत्र रूप से आकलन करना जरूरी होगा।कुल मिलाकर, ताइवान के नेताओं के रिश्तेदारों और उनसे जुड़े कारोबारियों पर कथित दबाव ने चीन-ताइवान विवाद को एक नया आयाम दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बीजिंग ऐसे कदमों को आगे बढ़ाता है या नहीं और ताइवान की राजनीतिक पार्टियां इन घटनाओं पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं।
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