
विश्व: दुनिया तेजी से ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की ओर बढ़ रही है। फैक्ट्री से लेकर अस्पताल, गोदाम, होटल और खेती तक अब मशीनों और रोबोट का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। आने वाले समय में रोबोटिक्स को उद्योगों की ताकत और उत्पादन क्षमता बढ़ाने का एक अहम साधन माना जा रहा है। इसी बीच सामने आई एक रिपोर्ट ने भारत और चीन के बीच ऑटोमेशन के अंतर को उजागर किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में दुनियाभर में करीब 5.55 लाख नए औद्योगिक रोबोट लगाए गए। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा चीन का रहा, जहां एक साल में करीब 2.95 लाख नए रोबोट स्थापित किए गए। वहीं भारत में इस दौरान केवल 9,100 औद्योगिक रोबोट लगाए गए। इस आंकड़े के कारण भारत ऑटोमेशन की वैश्विक दौड़ में चीन से काफी पीछे नजर आ रहा है।
चीन लंबे समय से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दुनिया के सबसे बड़े केंद्रों में शामिल रहा है। वहां इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और अन्य उद्योगों में उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़े स्तर पर रोबोट तकनीक अपनाई जा रही है। चीन में बढ़ती मजदूरी लागत, उत्पादन की मांग और सरकार की ओर से तकनीकी विकास को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने रोबोटिक्स को तेजी से आगे बढ़ाया है।
दूसरी ओर, भारत में भी औद्योगिक रोबोट के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसकी रफ्तार अभी चीन जैसे देशों की तुलना में कम है। भारत में रोबोट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल ऑटोमोबाइल सेक्टर में किया जाता है, जहां वेल्डिंग, पेंटिंग, असेंबली और गुणवत्ता जांच जैसे कामों के लिए मशीनों की मदद ली जाती है। हालांकि, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि, लॉजिस्टिक्स और छोटे उद्योगों में रोबोट का इस्तेमाल अभी शुरुआती स्तर पर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए ऑटोमेशन को बढ़ावा देना जरूरी है, क्योंकि इससे उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी। भारत सरकार भी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है। मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाओं का उद्देश्य देश में उत्पादन बढ़ाना और नई तकनीकों को अपनाने को प्रोत्साहित करना है।
हालांकि, भारत के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। देश में बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम उद्योग हैं, जिनके लिए रोबोटिक तकनीक में निवेश करना महंगा साबित हो सकता है। इसके अलावा कुशल तकनीकी कर्मचारियों की कमी और रोबोट संचालन से जुड़ी ट्रेनिंग की जरूरत भी एक बड़ी चुनौती है।
चीन की तुलना में भारत की आबादी और श्रम बाजार काफी अलग है। भारत में अभी भी कई उद्योगों में मानव श्रम पर निर्भरता ज्यादा है, जबकि चीन ने उत्पादन को तेज और अधिक कुशल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर मशीनों को अपनाया है। यही कारण है कि दोनों देशों के ऑटोमेशन आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
हालांकि, भारत के लिए अवसर भी काफी बड़े हैं। देश में तेजी से बढ़ता स्टार्टअप सेक्टर, तकनीकी शिक्षा का विस्तार और AI व रोबोटिक्स में बढ़ता निवेश आने वाले वर्षों में स्थिति बदल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत छोटे उद्योगों तक आधुनिक तकनीक पहुंचाने, रिसर्च बढ़ाने और रोबोटिक्स ट्रेनिंग को मजबूत करने पर ध्यान देता है, तो वह ऑटोमेशन की इस दौड़ में अपनी स्थिति बेहतर कर सकता है।
आज रोबोट सिर्फ फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं हैं। इनका इस्तेमाल अस्पतालों में सर्जरी और मरीजों की देखभाल, गोदामों में सामान पहुंचाने, होटलों में सेवाएं देने और खेती में निगरानी जैसे कामों में भी किया जा रहा है। ऐसे में आने वाले समय में जिस देश के पास बेहतर ऑटोमेशन तकनीक होगी, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में मजबूत भूमिका निभा सकेगा।
चीन का 2.95 लाख रोबोट का आंकड़ा उसकी तकनीकी ताकत को दिखाता है, जबकि भारत का 9,100 रोबोट का आंकड़ा बताता है कि देश को अभी लंबा सफर तय करना है। ऑटोमेशन की इस नई दुनिया में भारत के लिए तेजी से तकनीक अपनाना और उद्योगों को आधुनिक बनाना आने वाले वर्षों की बड़ी जरूरत बन गई है।





