
अयोध्या। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में नवनिर्मित भव्य राम मंदिर में दान राशि के कथित गबन के मामले ने देश की राजनीति और धार्मिक गलियारों में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। मामले में लगातार बढ़ती जांच और चौतरफा दबाव के बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और प्रमुख ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने शुक्रवार को अपने-अपने पदों से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश सरकार के निर्देश पर इस मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज होने के बाद विशेष जांच दल (एसआईटी) की कार्रवाई बेहद तेज हो गई है।
कैसे शुरू हुआ दान गबन का यह पूरा विवाद?
राम मंदिर के दान में हेराफेरी का यह संवेदनशील मामला तब सुर्खियों में आया, जब अयोध्या के पूर्व समाजवादी पार्टी (सपा) विधायक पवन पांडे ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि राम मंदिर निर्माण के लिए देश-विदेश से मिले दान में से करीब 7 से 7.5 करोड़ रुपये का गबन किया गया है। इन आरोपों के बाद जब विवाद बढ़ा, तो श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ही अनुरोध पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की तह तक जाने के लिए 14 जून को तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर दिया। शुरुआत में चंपत राय ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया था। हालांकि, उन्होंने सरकार द्वारा एसआईटी गठन के फैसले का स्वागत करते हुए जांच में पूर्ण सहयोग की बात कही थी।
एफआईआर दर्ज और करीबियों की गिरफ्तारी के बाद बढ़ा दबाव
मामले ने तब बेहद गंभीर रूप अख्तियार कर लिया, जब एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपी। इस रिपोर्ट के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं— 306, 316(5), 317(4), 317(5), 61 और 3(5) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। इस एफआईआर में अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, अविनाश शुक्ला, तिन्नू यादव और मनीष यादव समेत आठ लोगों को नामजद किया गया, जिन्हें बाद में गिरफ्तार भी कर लिया गया। पकड़े गए आरोपियों में चंपत राय का एक बेहद करीबी सहयोगी भी शामिल था, जिसके बाद जांच की आंच सीधे ट्रस्ट के शीर्ष नेतृत्व तक पहुँच गई। विपक्षी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि इस महाघोटाले में बड़े और प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश की जा रही है। इस बढ़ते राजनीतिक तनाव और चौतरफा घिरने के बाद आखिरकार चंपत राय ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
रसायन विज्ञान के शिक्षक से राम मंदिर आंदोलन के 'रिकॉर्ड कीपर' बनने का सफर
चंपत राय का इस्तीफा इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि वे राम मंदिर आंदोलन के सबसे पुराने और प्रमुख रणनीतिकारों में से एक रहे हैं। उनका जन्म साल 1946 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ था। वे बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा से गहरे जुड़े हुए थे। राम मंदिर आंदोलन में पूर्णकालिक रूप से कूदने से पहले चंपत राय बिजनौर के आरएसएम (RSM) डिग्री कॉलेज में रसायन विज्ञान (Chemistry) के प्रोफेसर (शिक्षक) थे। देश में आपातकाल (Emergency) के दौरान संघ से जुड़े होने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया था और उन्होंने लगभग 18 महीने जेल में काटे थे। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने वापस कॉलेज का रुख नहीं किया और अपना पूरा जीवन सामाजिक व धार्मिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। साल 1980 में वे औपचारिक रूप से विश्व हिंदू परिषद (VHP) में शामिल हुए और संगठन के सचिव से लेकर अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचे। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद जब साल 2020 में केंद्र सरकार द्वारा 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' का गठन किया गया, तो चंपत राय को उनकी वरिष्ठता और अनुभव को देखते हुए इसका महासचिव नियुक्त किया गया था।
क्यों कहे जाते हैं 'रामलला के रिकॉर्ड कीपर'?
चंपत राय को उनके सहयोगी और समर्थक अयोध्या का 'रिकॉर्ड कीपर' भी कहते हैं। माना जाता है कि अयोध्या नगरी के इतिहास, राम मंदिर से जुड़े विवादों के कानूनी दस्तावेजों, वहां की परंपराओं और एक-एक गली की जितनी बारीक व प्रामाणिक जानकारी चंपत राय को है, उतनी शायद ही किसी अन्य नेता को हो। कोर्ट की लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान भी दस्तावेजों को सहेजने में उनकी भूमिका बेहद अहम थी। बहरहाल, उनके इस्तीफे के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राम मंदिर ट्रस्ट का अगला महासचिव किसे नियुक्त किया जाता है और एसआईटी की जांच आगे क्या मोड़ लेती है।





