
x
क्वेटा। बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) की सदस्य गुलजादी बलोच को एक हत्या मामले में उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद संगठन और उनके वकीलों ने न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। BYC ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी बयान में फैसले की आलोचना करते हुए मामले और मुकदमे की कार्यवाही की स्वतंत्र एवं तत्काल समीक्षा की मांग की है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार क्वेटा के एडिशनल सेशंस जज-I सैयद कादिर शाह बुखारी ने केस नंबर 15/22 में गुलजादी बलोच को उम्रकैद की सजा सुनाई।यह मामला अक्टूबर 2022 में मच्छ पुलिस स्टेशन में दर्ज एक हत्या के केस से संबंधित बताया गया है। गुलजादी बलोच के वकीलों का कहना है कि वह मामले की मुख्य आरोपी नहीं थीं और उन्होंने हत्या में उनकी भूमिका से इनकार किया है। दूसरी ओर अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। फैसले को कानूनी माध्यम से चुनौती देने की बात भी बचाव पक्ष ने कही है।
BYC ने न्यायिक प्रक्रिया पर उठाए सवाल
BYC ने अपने बयान में दावा किया कि मुकदमे की कार्यवाही को लेकर संगठन पहले भी गंभीर चिंताएं जाहिर कर चुका था। संगठन के मुताबिक मामले की सुनवाई के दौरान कथित रूप से ऐसी परिस्थितियां सामने आईं, जिनसे निष्पक्ष सुनवाई और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठे।BYC ने आरोप लगाया कि न्यायाधीश ने मुकदमा पूरा होने से पहले कई मौकों पर खुद पर दबाव होने का जिक्र किया था और कथित रूप से यह संभावना जताई थी कि गुलजादी बलोच को उम्रकैद या मौत की सजा सुनानी पड़ सकती है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं हुई है।संगठन का कहना है कि यदि मुकदमे का अंतिम फैसला आने से पहले इस तरह की टिप्पणियां की गई थीं तो इससे न्यायिक निष्पक्षता और आरोपी को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष मानने के सिद्धांत को लेकर चिंता पैदा होती है।
बचाव पक्ष ने भी लगाए प्रक्रियागत आरोप
गुलजादी बलोच के वकीलों ने भी फैसला सुनाए जाने की प्रक्रिया को लेकर कई आरोप लगाए हैं। एडवोकेट इसरार बलोच के मुताबिक सजा सुनाए जाने से पहले गुलजादी बलोच का बयान पाकिस्तान की दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 342 के तहत दर्ज नहीं किया गया था।बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि उसे अंतिम दलीलें रखने का मौका नहीं दिया गया। वकीलों के अनुसार जिस समय फैसला सुनाया गया, उस समय गुलजादी और उनकी कानूनी टीम अदालत में मौजूद नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि बाद में अदालत के रीडर से उन्हें लिखित आदेश मिला। ये सभी दावे बचाव पक्ष के हैं और फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दिए जाने पर इनकी न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
न्यायिक हड़ताल के दौरान सुनवाई का भी आरोप
BYC ने आरोप लगाया है कि सितंबर की शुरुआत में न्यायिक हड़ताल और बचाव पक्ष के वकील की अनुपस्थिति के बावजूद मामले की कार्यवाही आगे बढ़ाई गई। संगठन के मुताबिक एक गवाह से उस समय जिरह हुई जब बचाव पक्ष का वकील मौजूद नहीं था।संगठन ने इसे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से जोड़ते हुए सवाल उठाया है। BYC का कहना है कि मुकदमे में अपनाई गई प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि गुलजादी बलोच को कानून के तहत उपलब्ध सभी अधिकार मिले थे या नहीं।
फैसले को चुनौती देगा बचाव पक्ष
गुलजादी बलोच की कानूनी टीम ने कहा है कि वह उपलब्ध कानूनी रास्तों का इस्तेमाल करते हुए उम्रकैद की सजा को चुनौती देगी। मामले में अपीलीय अदालत के सामने ट्रायल की प्रक्रिया और सजा से जुड़े मुद्दे उठाए जा सकते हैं।बचाव पक्ष की मुख्य आपत्तियों में धारा 342 के तहत बयान दर्ज नहीं किए जाने का दावा, अंतिम दलीलों का अवसर न मिलने का आरोप और फैसला सुनाए जाने की परिस्थितियां शामिल हैं।हालांकि निचली अदालत ने गुलजादी बलोच को दोषी ठहराया है, आगे की अपीलीय प्रक्रिया में फैसले और ट्रायल रिकॉर्ड की समीक्षा संभव है।
पहले से हिरासत में थीं गुलजादी
गुलजादी बलोच BYC से जुड़ी प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक सार्वजनिक संचार के अनुसार उन्हें 7 अप्रैल 2025 को क्वेटा में हिरासत में लिया गया था। दस्तावेज में उनकी गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित मानवाधिकार चिंताओं का उल्लेख किया गया था।एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी मार्च 2026 में गुलजादी बलोच समेत पांच बलोच कार्यकर्ताओं की हिरासत और जेल के भीतर चल रही सुनवाई को लेकर चिंता जताई थी। संगठन ने आरोप लगाया था कि कार्यकर्ताओं को निष्पक्ष सुनवाई से जुड़े अधिकार पर्याप्त रूप से नहीं मिल रहे हैं और उनकी रिहाई की मांग की थी। ये एमनेस्टी के निष्कर्ष और मांगें हैं, जबकि पाकिस्तानी न्यायिक प्रक्रिया अलग-अलग मामलों में जारी रही है।
BYC के अन्य नेताओं को भी मिली है सजा
गुलजादी बलोच का फैसला ऐसे समय आया है जब BYC के अन्य नेताओं के खिलाफ भी आपराधिक मामलों में न्यायिक कार्रवाई हुई है। रिपोर्टों के मुताबिक जून 2026 में BYC की प्रमुख आयोजक डॉ. महरंग बलोच और नेता सिबगतुल्लाह शाहजी को एक अलग मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।BYC ने उन फैसलों की भी आलोचना की थी और आरोप लगाया था कि संगठन के नेतृत्व को निशाना बनाया जा रहा है। दूसरी ओर जून के मामले में बलूचिस्तान सरकार के अधिकारियों ने कहा था कि आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई मिली और फैसला गवाहों तथा चिकित्सकीय साक्ष्यों के आधार पर दिया गया।
स्वतंत्र समीक्षा की मांग
गुलजादी बलोच को उम्रकैद की सजा मिलने के बाद BYC ने अपीलीय अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं से हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन चाहता है कि फैसले और मुकदमे की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा की जाए।BYC ने संबंधित न्यायाधीश के आचरण की जांच की मांग भी की है। संगठन का कहना है कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।फिलहाल निचली अदालत का उम्रकैद का फैसला प्रभावी है, जबकि बचाव पक्ष ने इसे कानूनी रूप से चुनौती देने की बात कही है। BYC द्वारा लगाए गए न्यायिक दबाव और प्रक्रियागत उल्लंघन के आरोप संगठन और बचाव पक्ष के दावे हैं। आगे अपीलीय अदालत में होने वाली कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि निचली अदालत की सजा और ट्रायल प्रक्रिया पर उठाई गई आपत्तियों पर उच्च न्यायपालिका क्या रुख अपनाती है।
Next Story





