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गुलाम व्यापार पर माफी की चर्चा को तैयार ब्रिटेन मुआवजे से बर्नहम का इनकार

nidhi
1 Nov 2026 11:22 AM IST
गुलाम व्यापार पर माफी की चर्चा को तैयार ब्रिटेन मुआवजे से बर्नहम का इनकार
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दास व्यापार पर एंडी बर्नहम का बड़ा बयान
लंदन: अटलांटिक पार दास व्यापार में ब्रिटेन की ऐतिहासिक भूमिका को लेकर प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने औपचारिक माफी की मांग पर बातचीत करने की इच्छा जताई है। उन्होंने आर्थिक मुआवजा देने की मांग खारिज कर दी है। राष्ट्रमंडल देशों के आगामी शिखर सम्मेलन से पहले सामने आया यह बयान महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्रिटेन ने औपचारिक माफी मांग ली है या उसकी घोषणा कर दी है। बर्नहम ने प्रभावित देशों और समुदायों के साथ व्यवस्थित संवाद में माफी की मांग सुनने का रास्ता खोला है।
बर्नहम ने दास व्यापार के कारण लाखों लोगों को हुई पीड़ा पर दुख और खेद व्यक्त किया। साथ ही उनका तर्क है कि आज के ब्रिटिश नागरिकों को ऐसे ऐतिहासिक अन्याय का आर्थिक उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जिनमें उनकी व्यक्तिगत भागीदारी नहीं थी। उनके बयान में दो अलग पहलू हैं। पहला इतिहास की क्रूरता स्वीकार करना और प्रभावित पक्षों की बात सुनना है। दूसरा वित्तीय क्षतिपूर्ति की मांग को स्वीकार नहीं करना है। इसलिए माफी पर संभावित बातचीत को मुआवजे की सहमति समझना सही नहीं होगा।
यह विषय एंटीगुआ और बारबुडा में होने वाली राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक से पहले चर्चा में आया है। कैरेबियाई देश लंबे समय से ब्रिटेन से दास व्यापार की विरासत स्वीकार करने और सुधारात्मक न्याय की दिशा में कदम उठाने की मांग करते रहे हैं। उनके लिए यह केवल अतीत की घटनाओं का प्रश्न नहीं है। वे ऐतिहासिक शोषण के प्रभावों को वर्तमान आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से भी जोड़ते हैं। ऐसे में बर्नहम की बातचीत की पेशकश संवाद की शुरुआत बन सकती है लेकिन इससे सभी मतभेद समाप्त नहीं हुए हैं।
दास व्यापार का इतिहास बेहद व्यापक और क्रूर रहा है। रॉयटर्स के अनुसार अटलांटिक पार दास व्यापार में कम से कम सवा करोड़ अफ्रीकियों को जबरन गुलाम बनाया गया। ट्रांसअटलांटिक स्लेव ट्रेड डेटाबेस के हवाले से रिपोर्ट में ब्रिटेन द्वारा लगभग 32 लाख लोगों को अटलांटिक के पार ले जाए जाने का उल्लेख है। इन लोगों को स्वतंत्रता और अधिकारों से वंचित किया गया था। यही इतिहास औपचारिक माफी और क्षतिपूर्ति की मांग का आधार है। प्रभावित देशों का कहना है कि इस विरासत पर गंभीर चर्चा जरूरी है।
बर्नहम के बयान का पहला राजनीतिक अर्थ यह है कि ब्रिटिश सरकार माफी के प्रश्न पर संवाद का अवसर दे रही है। औपचारिक राजकीय माफी व्यक्तिगत दुख या खेद से अलग होती है। उसमें सरकार की ओर से ऐतिहासिक भूमिका स्वीकार करने का स्पष्ट संदेश हो सकता है। हालांकि ऐसी माफी का स्वरूप क्या होगा और वह कब दी जाएगी यह अभी तय नहीं है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे संभावित नीतिगत बदलाव की दिशा में पहल कहा जा सकता है। इसे पूरी हो चुकी प्रक्रिया बताना जल्दबाजी होगी।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आर्थिक सहायता और ऐतिहासिक मुआवजे को ब्रिटिश नेतृत्व अलग रूप में प्रस्तुत कर रहा है। बर्नहम ने कमजोर आर्थिक स्थिति वाले देशों के कर्ज का बोझ कम करने की पहल प्रस्तावित की है। इसके तहत भुगतान के लिए लंबी अवधि और बेहतर ब्याज दरों पर काम करने की बात है। पूर्व प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन इस प्रयास में सहयोग करेंगे। यह प्रस्ताव विकासशील देशों को वित्तीय राहत देने की दिशा में है लेकिन ब्रिटिश सरकार इसे दास व्यापार के लिए मुआवजा देने की स्वीकृति नहीं बता रही है।
कैरेबियाई देशों की सुधारात्मक न्याय की मांग भी केवल सीधे नकद भुगतान तक सीमित नहीं है। इसमें कर्ज राहत, विकास के लिए वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने में सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं। इसलिए कर्ज पर ब्रिटेन की पहल और प्रभावित देशों की मांगों के बीच कुछ विषय साझा दिखाई देते हैं। फिर भी दोनों पक्षों की सोच में अंतर बना हुआ है। सहायता को भविष्य के सहयोग के रूप में देखना और उसे ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई मानना अलग राजनीतिक तथा नैतिक दृष्टिकोण हैं।
प्रतिक्रियाओं में सावधानी के साथ स्वागत का रुख दिखाई दिया है। बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली ने दास व्यापार की क्रूरता स्वीकार करने और औपचारिक माफी पर बातचीत की इच्छा का स्वागत किया। जमैका के प्रधानमंत्री एंड्रयू होलनेस ने कठिन मुद्दों पर खुले संवाद को सकारात्मक शुरुआत बताया। वहीं एंटीगुआ और बारबुडा के प्रधानमंत्री गैस्टन ब्राउन ने व्यावहारिक सहायता के प्रस्तावों का स्वागत करते हुए स्पष्ट किया कि सुधारात्मक न्याय पर कैरेबियाई देशों की स्थिति नहीं बदली है। यानी बातचीत की संभावना बढ़ी है लेकिन मूल मांगें कायम हैं।
किंग चार्ल्स की कैरेबियाई यात्रा के कारण भी यह मुद्दा प्रमुखता में है। उन्होंने अतीत की पीड़ा और अन्याय को स्वीकार करने की जरूरत बताई है जबकि औपचारिक सरकारी माफी का प्रश्न ब्रिटिश सरकार की नीति से जुड़ा है। बर्नहम के बयान की वास्तविक अहमियत अब आगे होने वाले संवाद से स्पष्ट होगी। प्रभावित पक्ष यह देखेंगे कि बातचीत के साथ कौन से ठोस कदम उठते हैं। फिलहाल ब्रिटेन माफी की मांग सुनने को तैयार है लेकिन आर्थिक मुआवजे के प्रश्न पर उसका इनकार बरकरार है।
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