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खेती में बायोलॉजिकल कंट्रोल पर ब्राज़ील का जोर

Ratna Netam
1 Oct 2026 4:20 PM IST
खेती में बायोलॉजिकल कंट्रोल पर ब्राज़ील का जोर
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Sao पाउलो : ब्राज़ील अपनी कृषि व्यवस्था में बायोलॉजिकल कंट्रोल टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ा रहा है। देश का जोर ऐसे वैज्ञानिक समाधानों पर है, जिनकी मदद से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों और बीमारियों को नियंत्रित किया जा सके और रासायनिक उपायों पर निर्भरता कम की जा सके। इसी दिशा में पिरासिकाबा स्थित ‘एडवांस्ड रिसर्च सेंटर ऑन बायोलॉजिकल कंट्रोल’ यानी SPARCBio ट्रॉपिकल खेती के लिए नई तकनीक, बायोलॉजिकल एजेंट और उत्पाद विकसित करने पर काम कर रहा है।
SPARCBio ब्राज़ील की कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे समाधान विकसित कर रहा है, जो बड़े खुले खेतों, गर्म और आर्द्र ट्रॉपिकल जलवायु तथा एक वर्ष में कई फसल चक्रों वाली खेती में प्रभावी साबित हो सकें। सेंटर का मुख्य उद्देश्य ‘इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट’ यानी IPM के लिए वैज्ञानिक आधार मजबूत करना और किसानों को कीट एवं रोग प्रबंधन के नए विकल्प उपलब्ध कराना है।
यह अनुसंधान केंद्र यूनिवर्सिटी ऑफ साओ पाउलो के ‘लुइज़ डी क्विरोज़ स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर’ यानी ESALQ/USP, साओ पाउलो रिसर्च फाउंडेशन यानी FAPESP और बायोलॉजिकल कंट्रोल क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी कोप्पर्ट के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इस साझेदारी के जरिए अकादमिक शोध, वैज्ञानिक विशेषज्ञता और व्यावहारिक कृषि जरूरतों को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है।
SPARCBio का काम केवल किसी एक कीट या फसल तक सीमित नहीं है। सेंटर विभिन्न तरह के बायोलॉजिकल एजेंट, नए उत्पाद और वैज्ञानिक जानकारी विकसित करने पर काम कर रहा है, ताकि इन्हें व्यापक IPM कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जा सके। इस तरह की व्यवस्था में कीटों को नियंत्रित करने के लिए प्राकृतिक दुश्मनों, सूक्ष्मजीवों और अन्य जैविक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है।
SPARCBio के डायरेक्टर प्रोफेसर जोस रॉबर्टो पोस्टाली पारा का कहना है कि ब्राज़ील की कृषि परिस्थितियां दुनिया के कई दूसरे देशों से अलग हैं। यहां की ट्रॉपिकल जलवायु, विशाल कृषि क्षेत्र और लगातार होने वाले फसल चक्रों के कारण कीट प्रबंधन के लिए भी अलग तरह की तकनीक की जरूरत होती है।
उनके अनुसार ब्राज़ील ने ठंडे या समशीतोष्ण क्षेत्रों में विकसित मॉडलों को सीधे अपनाने के बजाय अपनी कृषि जरूरतों के हिसाब से वैज्ञानिक आधार विकसित किया है। इसका मतलब यह है कि बायोलॉजिकल कंट्रोल की तकनीक को स्थानीय तापमान, नमी, फसल प्रणाली और कीटों के व्यवहार के अनुसार ढाला गया है।
ब्राज़ील में एक ही वर्ष के दौरान कई फसलें उगाई जाती हैं। इसके कारण विभिन्न मौसमों में कीटों के सक्रिय रहने की संभावना भी बनी रहती है। ऐसे में केवल पारंपरिक रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर रहने के बजाय लंबे समय तक काम करने वाली और स्थानीय पर्यावरण के अनुरूप रणनीति जरूरी हो जाती है।
बायोलॉजिकल कंट्रोल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आया है। इसमें ऐसे जीवों या सूक्ष्मजीवों का इस्तेमाल किया जाता है, जो प्राकृतिक रूप से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को नियंत्रित कर सकते हैं। यह तरीका IPM की व्यापक रणनीति के साथ इस्तेमाल किया जाता है।
प्रोफेसर पारा के अनुसार ब्राज़ील में बायोलॉजिकल कंट्रोल को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए वर्ष 2013 एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इसी दौरान ‘हेलिकोवर्पा आर्मिगेरा’ नामक कीट का प्रकोप सामने आया। इस कीट ने विभिन्न फसलों के लिए गंभीर चुनौती पैदा की और किसानों तथा वैज्ञानिकों को नए नियंत्रण उपायों की जरूरत महसूस हुई।
हेलिकोवर्पा आर्मिगेरा से निपटने के लिए खास वायरस आधारित समाधानों और ‘ट्राइकोग्रामा प्रीटियोसम’ जैसे बायोलॉजिकल एजेंट का इस्तेमाल किया गया। इन जैविक उपायों ने बड़े कृषि क्षेत्रों में बायो-इनपुट के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ट्राइकोग्रामा प्रीटियोसम एक ऐसा बायोलॉजिकल एजेंट है, जिसका उपयोग कीटों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। इस तरह के प्राकृतिक एजेंटों का उपयोग किसानों को कीट प्रबंधन का वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही वायरस आधारित बायोलॉजिकल उत्पादों ने भी विशेष कीटों को नियंत्रित करने में अपनी उपयोगिता दिखाई।
हेलिकोवर्पा आर्मिगेरा की चुनौती के बाद ब्राज़ील में किसानों और कृषि कंपनियों का ध्यान बायोलॉजिकल कंट्रोल की ओर तेजी से बढ़ा। इससे पहले इस तकनीक का इस्तेमाल सीमित स्तर पर किया जाता था, लेकिन बड़े पैमाने पर कीट प्रकोप के बाद बायोलॉजिकल समाधान की मांग बढ़ने लगी।
SPARCBio अब इसी अनुभव को आगे बढ़ाते हुए नई तकनीकों पर शोध कर रहा है। सेंटर का उद्देश्य ऐसे बायोलॉजिकल उत्पाद तैयार करना है जिन्हें बड़े खुले खेतों में आसानी से इस्तेमाल किया जा सके और जिनका प्रभाव ब्राज़ील की जलवायु परिस्थितियों में भी बना रहे।
इसके साथ ही वैज्ञानिक यह भी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अलग-अलग बायोलॉजिकल एजेंटों को किस फसल, किस मौसम और किस प्रकार के कीट के खिलाफ सबसे प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए प्रयोगशाला से लेकर खेतों तक कई स्तरों पर अध्ययन किया जा रहा है।
ब्राज़ील की कृषि में सोयाबीन, मक्का और अन्य बड़े पैमाने की फसलों का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसे विशाल कृषि क्षेत्रों में कीटों का प्रभाव भी बड़े पैमाने पर हो सकता है। इसलिए ऐसी तकनीक जरूरी है जिसे व्यापक क्षेत्र में प्रभावी रूप से लागू किया जा सके।
बायोलॉजिकल कंट्रोल को बढ़ावा देने के पीछे एक उद्देश्य कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ बनाना भी है। अगर कीट प्रबंधन के लिए प्राकृतिक और जैविक विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ता है तो किसानों के पास फसल सुरक्षा के अधिक विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।
SPARCBio का शोध इस बात पर केंद्रित है कि बायोलॉजिकल कंट्रोल को आधुनिक कृषि प्रणाली के साथ किस तरह बेहतर तरीके से जोड़ा जाए। IPM में जैविक नियंत्रण के साथ निगरानी, फसल प्रबंधन और जरूरत के अनुसार दूसरे उपाय भी शामिल किए जाते हैं।
ब्राज़ील का अनुभव यह दिखाता है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वैज्ञानिक तकनीक विकसित करना कृषि क्षेत्र में कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। देश ने दूसरे क्षेत्रों के मॉडल की नकल करने के बजाय अपनी ट्रॉपिकल खेती को ध्यान में रखकर बायोलॉजिकल कंट्रोल का अलग ढांचा तैयार किया है।
अब SPARCBio जैसे अनुसंधान केंद्र इस दिशा में नए उत्पाद, वैज्ञानिक जानकारी और व्यावहारिक समाधान विकसित करने में जुटे हैं। हेलिकोवर्पा आर्मिगेरा के प्रकोप के बाद तेजी से बढ़ा बायो-इनपुट का इस्तेमाल ब्राज़ील की कृषि में एक नए बदलाव का संकेत देता है। आने वाले समय में बायोलॉजिकल कंट्रोल तकनीक देश की इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट रणनीति का और महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।
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