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Delhi दिल्ली: एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति 25 करोड़ की आबादी को सतत प्रगति की ओर ले जाने में सक्षम नहीं है। देश के सभी 20 प्राथमिक निर्यात उत्पादों और छह प्रमुख निर्यात कारकों पर असर डालने वाली बहुआयामी बाधाओं के कारण आर्थिक सुधार संभव नहीं हो पा रहा है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को दोष देना पाकिस्तान के लिए कोई समाधान नहीं है, जबकि देश लगभग हर आर्थिक पैमाने पर गंभीर संकट से जूझ रहा है।
डॉन अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा गठित एक पैनल ने उद्योग जगत के हितधारकों से चर्चा के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा। यह पैनल अगले वर्ष के अंत में मौजूदा बेलआउट कार्यक्रम की अवधि समाप्त होने के बाद आईएमएफ कार्यक्रम से बाहर निकलने की रणनीति तैयार करने के लिए बनाया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि पैनल द्वारा “सरकार की ओर से आर्थिक सुधारों को आक्रामक रूप से लागू न कर पाने की जिम्मेदारी को आईएमएफ की सख्त वित्तीय शर्तों पर डालना, दरअसल राज्य की अपनी कर्तव्यहीनता पर पर्दा डालने का प्रयास है। इसके अलावा, आर्थिक और निर्यात वृद्धि में बाधा बनने वाले जिन कारणों का उल्लेख पैनल ने किया है, जैसे ऊर्जा की ऊंची और अस्थिर लागत, नीतियों की अनिश्चितता, विकृत कर व्यवस्था, लॉजिस्टिक्स और व्यापार सुविधा से जुड़ी अड़चनें, संस्थागत विखंडन और नियामकीय बोझ, ये कोई नए मुद्दे नहीं हैं।
रिपोर्ट में कहा गया, “इन समस्याओं का जिक्र पहले भी दानदाताओं, सरकारी रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों में बार-बार होता रहा है। आईएमएफ सरकार को अनुकूल कारोबारी माहौल बनाने के लिए प्रोत्साहित करता रहा है। इसके विपरीत, रिपोर्ट के मुताबिक, “पाकिस्तानी अधिकारी सुस्त और जड़ हो चुकी अर्थव्यवस्था के लिए आईएमएफ कार्यक्रम को दोषी ठहरा रहे हैं, ताकि अपनी अक्षमता को छिपाया जा सके और सत्तारूढ़ दल की उस अनिच्छा पर पर्दा डाला जा सके, जिसमें वह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त किराया-खोरी (रेंट-सीकिंग) ढांचों को खत्म नहीं करना चाहता।
डॉन की एक अन्य हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएमएफ की कठोर आर्थिक सोच पाकिस्तान को वर्षों तक कम-विकास के जाल में फंसा सकती है। मौजूदा रणनीति पर बुनियादी पुनर्विचार और लागू की जा रही दिखावटी वित्तीय सख्ती में बदलाव के बिना, अर्थव्यवस्था लंबे समय तक प्रभावित रहेगी और आम पाकिस्तानी बेवजह इसका खामियाजा भुगतते रहेंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 से अब तक मौजूदा सरकार ने आईएमएफ की निगरानी में “कठोर मितव्ययिता नीतियों के जरिए आम पाकिस्तानियों पर भारी बोझ” डाला है। इसमें कहा गया, “सरकार ने अपने या अपने समर्थकों के खर्च में किसी तरह की कटौती करने के बजाय भारी करों और सब्सिडी में कटौती के जरिए बड़े पैमाने पर वित्तीय समायोजन किया है,” जो आम जनता के लिए और अधिक पीड़ादायक साबित हुआ है।
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