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जंग के माहौल में भारतीय नौसेना का बड़ा मिशन भूमध्यसागर तक बढ़ी मौजूदगी
Ratna Netam
10 Sept 2026 9:53 PM IST

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पश्चिम एशिया : युद्ध और तनाव के बीच समुद्री रास्तों की सुरक्षा पूरी दुनिया के लिए बड़ी चिंता बन गई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से लेकर लाल सागर और बाब-अल-मंदेब तक हालात लगातार संवेदनशील बने हुए हैं। इसी बदलते सुरक्षा माहौल में भारतीय नौसेना की हिंद महासागर से बाहर पश्चिमी समुद्री क्षेत्र और भूमध्यसागर तक बढ़ती सक्रियता रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी अहम है क्योंकि पश्चिम एशिया से आने वाला ऊर्जा व्यापार और यूरोप की ओर जाने वाला बड़ा समुद्री कारोबार इन्हीं समुद्री मार्गों से जुड़ा है। बाब-अल-मंदेब लाल सागर का दक्षिणी प्रवेश द्वार है और यहां से जहाज स्वेज नहर के जरिए भूमध्यसागर तक पहुंचते हैं। मौजूदा तनाव में हूती लड़ाकों की गतिविधियों ने इस समुद्री चोकपॉइंट की अहमियत और बढ़ा दी है।
भारतीय नौसेना का पश्चिम की तरफ विस्तार इसलिए केवल सैन्य अभ्यास की कहानी नहीं है। इसके पीछे समुद्री व्यापार की सुरक्षा, मित्र देशों के साथ तालमेल, युद्धपोतों की लंबी दूरी की ऑपरेशनल क्षमता और जरूरत पड़ने पर भारतीय हितों की रक्षा करने की तैयारी भी है।
क्यों इतना महत्वपूर्ण है भूमध्यसागर?
भारत से यूरोप की तरफ जाने वाले जहाज अरब सागर से आगे बढ़ते हुए अदन की खाड़ी, बाब-अल-मंदेब, लाल सागर और स्वेज नहर से भूमध्यसागर पहुंचते हैं।
यही समुद्री रास्ता एशिया और यूरोप के बीच सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक कॉरिडोर में शामिल है।
अगर लाल सागर या बाब-अल-मंदेब में हालात खराब होते हैं तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप से घूमकर जाना पड़ सकता है। इससे यात्रा लंबी होने के साथ ईंधन, बीमा और माल ढुलाई की लागत भी बढ़ सकती है।
इसलिए भारत के लिए हिंद महासागर की सुरक्षा और भूमध्यसागर की स्थिति को अलग-अलग करके देखना मुश्किल है।
आज भारत का समुद्री व्यापार जितना वैश्विक हो रहा है, भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल पहुंच भी उतनी ही दूर तक महत्वपूर्ण होती जा रही है।
मिडिल ईस्ट में हालात क्यों बढ़ा रहे चिंता?
इस समय पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध ने समुद्री व्यापार पर सीधा असर डाला है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल व्यापार बाधित हुआ है और कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है।
दूसरी तरफ यमन में हूती लड़ाकों की गतिविधियां फिर तेज हुई हैं।
रॉयटर्स की 10 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक हूती पश्चिमी यमन में रणनीतिक बढ़त बनाते हुए बाब-अल-मंदेब के करीब अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट में से एक है।
यही वह क्षेत्र है जहां से खाड़ी का तेल लाल सागर होते हुए स्वेज नहर और फिर भूमध्यसागर की तरफ जाता है।
इसलिए भारतीय नौसेना के लिए पश्चिमी समुद्री क्षेत्र की निगरानी और मित्र नौसेनाओं के साथ तालमेल का महत्व काफी बढ़ जाता है।
भारत पहले से कर रहा समुद्री मार्गों की निगरानी
भारत ने हालिया संकट शुरू होने के बाद अचानक इस क्षेत्र की तरफ ध्यान नहीं दिया है।
भारतीय नौसेना **ऑपरेशन संकल्प** के तहत जून 2019 से खाड़ी क्षेत्र और Gulf of Oman में लगातार मौजूदगी बनाए हुए है। जून 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आवागमन फिर शुरू होने के बावजूद भारतीय नौसेना ने Gulf of Oman में अपनी मौजूदगी जारी रखने का फैसला किया था।
जरूरत पड़ने पर भारत की ओर आने वाले व्यापारिक जहाजों को एस्कॉर्ट देने की क्षमता भी इस तैनाती का हिस्सा है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय नौसेना लंबे समय से इस क्षेत्र में कम से कम एक युद्धपोत को हेलिकॉप्टर और मरीन कमांडो के साथ तैनात रखती आई है।
इससे साफ है कि भारत के लिए अरब सागर से Gulf of Oman तक की मौजूदगी अब अस्थायी नहीं बल्कि दीर्घकालीन समुद्री सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बन चुकी है।
भूमध्यसागर तक जाने का असली मकसद क्या?
भारतीय नौसेना के युद्धपोतों की भूमध्यसागर में तैनाती के कई उद्देश्य होते हैं।
पहला मकसद मित्र देशों की नौसेनाओं के साथ **इंटरऑपरेबिलिटी** बढ़ाना है। इसका मतलब है कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की प्रक्रियाओं को समझते हुए साथ ऑपरेशन कर सकें।
दूसरा उद्देश्य युद्धपोत और चालक दल की लंबी दूरी की ऑपरेशनल क्षमता को परखना है।
तीसरा बड़ा उद्देश्य रक्षा कूटनीति है।
जब भारतीय युद्धपोत किसी मित्र देश के बंदरगाह पर पहुंचता है तो वहां केवल ईंधन या रसद नहीं ली जाती। दोनों देशों के नौसैनिक अधिकारियों की बैठकें, जहाजों का दौरा, पेशेवर बातचीत, अभ्यास और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
भारतीय नौसेना ने अपने पिछले Mediterranean deployments में भी इन्हीं उद्देश्यों को प्रमुखता दी है। सितंबर 2025 में INS Trikand की भूमध्यसागर तैनाती के दौरान रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि इसका उद्देश्य पार्टनर समुद्री देशों के साथ पेशेवर नौसैनिक संपर्क और इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाना है।
मिस्र के साथ बड़े अभ्यास में दिखी ताकत
भूमध्यसागर में भारत की रणनीतिक सक्रियता का एक उदाहरण मिस्र के साथ सैन्य सहयोग है।
INS Trikand सितंबर 2025 में Alexandria पहुंचा था और उसने बहुराष्ट्रीय Exercise Bright Star में हिस्सा लिया था।
इस अभ्यास में भारत के अलावा अमेरिका, मिस्र, सऊदी अरब, कतर, ग्रीस और इटली जैसे देशों की सेनाओं ने भी भाग लिया। अभ्यास में हवा, जमीन और समुद्र तीनों क्षेत्रों में ऑपरेशनल तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया गया था।
ऐसे अभ्यास भारत को अलग-अलग देशों के सैन्य प्लेटफॉर्म और ऑपरेशनल प्रक्रियाओं के साथ काम करने का अनुभव देते हैं।
ग्रीस के साथ भी बढ़ा नौसैनिक सहयोग
मिस्र के बाद भारतीय नौसेना ने ग्रीस के साथ भी भूमध्यसागर में समुद्री सहयोग बढ़ाया।
सितंबर 2025 में भारतीय नौसेना और Hellenic Navy ने भूमध्यसागर में अपना पहला द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास पूरा किया था।
भारत की तरफ से INS Trikand ने इसमें हिस्सा लिया। पहले Salamis Naval Base पर हार्बर फेज हुआ और उसके बाद समुद्र में दोनों नौसेनाओं ने अभ्यास किया।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक दोनों देशों के साझा हितों में समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा, स्थिरता और स्वतंत्र नौवहन शामिल हैं।
यह सहयोग आज इसलिए और महत्वपूर्ण दिखाई देता है क्योंकि ग्रीस पूर्वी भूमध्यसागर का महत्वपूर्ण देश है और भारत यूरोप के साथ अपने सामरिक संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है।
साइप्रस तक पहुंच चुका है भारतीय युद्धपोत
भारतीय नौसेना की Mediterranean outreach साइप्रस तक भी पहुंची है।
सितंबर 2025 में INS Trikand साइप्रस के Limassol पहुंचा था। वहां भारतीय और साइप्रस नौसेना के अधिकारियों के बीच बातचीत के साथ प्रोफेशनल इंटरैक्शन और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए थे।
रक्षा मंत्रालय ने उस समय साफ कहा था कि इस यात्रा का उद्देश्य रक्षा और समुद्री सहयोग मजबूत करना तथा maritime security और capacity building में तालमेल बढ़ाना है।
यानी भूमध्यसागर में भारत केवल युद्धपोत भेजकर अपनी मौजूदगी नहीं दिखा रहा, बल्कि अलग-अलग देशों के साथ दीर्घकालीन रक्षा संबंध भी बना रहा है।
10 देशों तक पहुंचना क्यों बड़ी बात?
लंबी दूरी की नौसैनिक तैनाती में अलग-अलग देशों के बंदरगाहों तक पहुंचना भारत की बढ़ती **blue-water capability** का संकेत है।
ब्लू-वॉटर नेवी उस नौसैनिक क्षमता को कहा जाता है जिसमें कोई देश अपने तट के आसपास ही नहीं बल्कि हजारों समुद्री मील दूर जाकर लंबे समय तक ऑपरेशन कर सके।
ऐसे अभियान में जहाज को लगातार ईंधन, भोजन, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी रखरखाव और चालक दल के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट की जरूरत पड़ती है।
इसलिए कई देशों और हजारों नॉटिकल मील में फैली तैनाती वास्तव में नौसेना की लॉजिस्टिक्स और ऑपरेशनल क्षमता की भी परीक्षा होती है।
भारतीय नौसेना के प्रशिक्षण और ओवरसीज डिप्लॉयमेंट में पहले भी कैडेटों को कई देशों तक ले जाया गया है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार एक प्रशिक्षण वर्ष में नौसेना के जहाजों पर सवार NCC कैडेटों ने ओवरसीज डिप्लॉयमेंट के तहत 10 देशों का दौरा किया था।
हालांकि **“10 देश और ठीक 17,400 नॉटिकल मील”** वाले आंकड़े को मौजूदा 2026 भूमध्यसागरीय युद्धपोत तैनाती से जोड़ने की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध ताजा रक्षा मंत्रालय स्रोतों में स्पष्ट नहीं मिली है। इसलिए इस संख्या को किसी एक वर्तमान मिशन का पुष्ट आधिकारिक आंकड़ा मानने से पहले संबंधित नौसैनिक मिशन/जहाज की आधिकारिक रिलीज देखना जरूरी है।
समुद्री कूटनीति भी है बड़ा हथियार
नौसेना केवल युद्ध लड़ने के लिए नहीं होती। शांतिकाल में युद्धपोत किसी देश की विदेश नीति का प्रभावी माध्यम भी बनते हैं।
इसीलिए नौसेना की ऐसी यात्राओं को कई बार **Naval Diplomacy** कहा जाता है।
भारतीय जहाज जब मिस्र, ग्रीस, साइप्रस या दूसरे देशों के बंदरगाहों पर पहुंचते हैं तो भारत की सैन्य क्षमता के साथ उसकी कूटनीतिक मौजूदगी भी दिखाई देती है।
जहाजों के बीच संयुक्त अभ्यास से लेकर नौसैनिक अधिकारियों की मुलाकात तक, ये गतिविधियां भविष्य में किसी समुद्री संकट, मानवीय सहायता, निकासी अभियान या व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के समय काम आ सकती हैं।
Middle East संकट में भारत के लिए क्या दांव पर?
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए पश्चिम एशिया बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करता है और लाखों भारतीय खाड़ी देशों में रहते हैं। इसके अलावा यूरोप के साथ भारत का बड़ा व्यापार समुद्री रास्तों पर निर्भर है।
अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, बाब-अल-मंदेब या स्वेज कॉरिडोर में गंभीर व्यवधान आता है तो इसका असर जहाजों की आवाजाही, तेल कीमतों, बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई पर पड़ सकता है।
वर्तमान युद्ध में होर्मुज के जरिए तेल व्यापार में व्यवधान पहले ही वैश्विक बाजार को प्रभावित कर चुका है।
वहीं हूती गतिविधियों के कारण बाब-अल-मंदेब पर नया खतरा पैदा हो रहा है।
इसलिए भारतीय नौसेना की पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में मौजूदगी भारत के आर्थिक हितों से भी सीधे जुड़ी हुई है।
क्या भारतीय नौसेना जंग में शामिल होने गई है?
नहीं। भारतीय नौसेना की भूमध्यसागर या पश्चिम एशियाई समुद्री क्षेत्रों में तैनाती को सीधे मौजूदा युद्ध में भारत की सैन्य भागीदारी नहीं माना जाना चाहिए।
भारत के नौसैनिक deployments में समुद्री सुरक्षा, अभ्यास, प्रशिक्षण, मित्र देशों के साथ सहयोग, पोर्ट कॉल और व्यापारिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे कई उद्देश्य होते हैं।
भारत बहुराष्ट्रीय maritime-security frameworks में भी अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। फरवरी 2026 में भारतीय नौसेना ने पहली बार Combined Maritime Forces की **Combined Task Force 154** की कमान संभाली। यह टास्क फोर्स समुद्री सुरक्षा से जुड़ी ट्रेनिंग और क्षमता निर्माण पर केंद्रित है और CMF में 47 देश शामिल हैं।
इससे संकेत मिलता है कि भारत समुद्री सुरक्षा में केवल अपने तटों तक सीमित रहने के बजाय एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा भागीदार के रूप में भूमिका बढ़ा रहा है।
हिंद महासागर से भूमध्यसागर तक भारत का संदेश
मौजूदा हालात में भारतीय नौसेना की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—भारत अपने समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए दूर तक ऑपरेट करने की क्षमता विकसित कर रहा है।
हिंद महासागर भारत का प्राथमिक क्षेत्र है, लेकिन भारतीय व्यापार और ऊर्जा हित वहीं समाप्त नहीं होते।
अरब सागर से Gulf of Oman, अदन की खाड़ी, लाल सागर, स्वेज और भूमध्यसागर तक पूरा कॉरिडोर भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
इसीलिए हजारों नॉटिकल मील की तैनाती, मित्र देशों के बंदरगाहों पर पोर्ट कॉल और विदेशी नौसेनाओं के साथ युद्धाभ्यास भविष्य की समुद्री रणनीति का हिस्सा हैं।
पश्चिम एशिया में जंग और तनाव ने इस रणनीति की अहमियत और बढ़ा दी है। एक तरफ होर्मुज में ऊर्जा आपूर्ति का संकट है तो दूसरी तरफ बाब-अल-मंदेब पर हूती गतिविधियों ने वैश्विक शिपिंग के लिए नई चुनौती पैदा कर दी है।
ऐसे माहौल में भूमध्यसागर तक भारतीय नौसेना की पहुंच यह बताती है कि भारत अपनी नौसेना को केवल तटीय सुरक्षा बल के रूप में नहीं बल्कि लंबी दूरी तक काम करने वाली **ब्लू-वॉटर फोर्स और समुद्री कूटनीति के प्रमुख साधन** के रूप में आगे बढ़ा रहा है।
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