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G7 देशों में बनी सहमति
वॉशिंगटन: दुनिया में बढ़ती ईंधन कीमतों और सप्लाई को लेकर बनी चिंता के बीच G7 देशों ने बड़ा फैसला लिया है। समूह के सदस्य देशों ने अपने आपातकालीन भंडार से 10 करोड़ बैरल यानी 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और ईंधन बाजार में जारी करने पर सहमति जताई है। यह प्रक्रिया तत्काल शुरू होगी और करीब चार महीने तक चलेगी। शुरुआती 20 दिनों में डीजल की बड़ी मात्रा जारी करने की योजना है।
यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से बढ़ते दबाव के बीच सामने आया है। अमेरिका में डीजल और दूसरे ईंधनों की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता बनी हुई है। ट्रंप प्रशासन यूरोपीय देशों पर अपने आपातकालीन डीजल भंडार से ईंधन जारी करने का दबाव बना रहा था। अमेरिका की ओर से डीजल निर्यात पर संभावित रोक की चर्चा भी सामने आई थी, जिससे खासतौर पर यूरोप की ईंधन आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका थी।
G7 के फैसले के अनुसार, 100 मिलियन बैरल तेल और ईंधन की रिलीज अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA के समन्वय से की जाएगी। चार महीने की अवधि में यह ईंधन बाजार तक पहुंचाया जाएगा। हालांकि, डीजल की मौजूदा किल्लत को देखते हुए शुरुआती चरण में इसकी आपूर्ति पर ज्यादा जोर रहेगा। पहले 20 दिनों के भीतर डीजल की बड़ी मात्रा बाजार में उतारने की बात कही गई है।
G7 देशों ने ऊर्जा और ऊर्जा उत्पादों के निर्यात पर आपसी प्रतिबंध नहीं लगाने की प्रतिबद्धता भी जताई है। इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई को बनाए रखना और ऐसे कदमों से बचना है जिनसे पहले से दबाव झेल रहे ईंधन बाजार में कीमतें और तेजी से बढ़ सकती हैं। इसके साथ ही रिफाइनरियों की क्षमता और उत्पादन बढ़ाने से जुड़े उपायों पर भी जोर दिया गया है। G7 में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान शामिल हैं। इन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की ओर से एक साथ आपातकालीन भंडार खोलने का फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए अहम माना जा रहा है। इसका उद्देश्य बाजार में अतिरिक्त सप्लाई उपलब्ध कराकर तेल और डीजल की कीमतों पर बने दबाव को कम करना है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की अध्यक्षता में G7 नेताओं की वर्चुअल बैठक हुई। बैठक से पहले मैक्रों और ट्रंप के बीच बातचीत भी हुई थी। इसके बाद सदस्य देशों के बीच आपातकालीन भंडार से तेल और डीजल जारी करने पर सहमति बनी। फैसले की घोषणा के बाद तेल और डीजल बाजार में कीमतों पर तत्काल असर भी देखने को मिला। हालांकि, लंबे समय में इसका कितना असर होगा, यह वैश्विक मांग, आपूर्ति की स्थिति, रिफाइनिंग क्षमता और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। फिलहाल G7 का जोर बाजार में अतिरिक्त ईंधन पहुंचाकर सप्लाई की चिंता कम करने और कीमतों में तेजी को नियंत्रित करने पर है।
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