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Dhaka ढाका। बांग्लादेश में अगले महीने होने वाले आम चुनाव की तैयारियों के बीच महिलाओं, लड़कियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इससे मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की देश के नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा में विफलता उजागर हो रही है। न्यूयॉर्क स्थित ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) ने पुलिस आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा है कि जनवरी से जून 2025 के बीच लैंगिक हिंसा के मामलों में 2024 की समान अवधि की तुलना में बढ़ोतरी हुई है।
एचआरडब्ल्यू की महिला अधिकार प्रभाग की वरिष्ठ समन्वयक शुभजीत साहा ने लिखा, “बांग्लादेश महिला परिषद (बीएमपी) की अध्यक्ष डॉ. फौजिया मोस्लेम इस बढ़ोतरी को उन धार्मिक समूहों की गतिविधियों और बयानबाजी से जोड़ती हैं, जो महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही और समाज में उनकी भागीदारी को सीमित करना चाहते हैं। मई 2025 में कट्टरपंथी धार्मिक समूहों ने लैंगिक समानता और महिला अधिकारों में सुधार के अंतरिम सरकार के प्रयासों का विरोध किया और उन गतिविधियों को बंद करने की मांग की जिन्हें वे ‘इस्लाम-विरोधी’ मानते हैं। इसके बाद से महिलाओं और लड़कियों को मौखिक, शारीरिक और डिजिटल उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है, जिससे हिंसा के डर के कारण उनकी आवाज और अधिक दब रही है।
12 फरवरी को होने वाला आम चुनाव अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के सत्ता से हटने के बाद पहला चुनाव होगा। एचआरडब्ल्यू रिपोर्ट में हाल के महीनों में हिंदुओं और जातीय अल्पसंख्यकों पर बढ़े हमलों का भी जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, “दिसंबर में 27 वर्षीय दीपूचंद्र दास की कथित ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। अधिकार समूहों ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की कम से कम 51 घटनाएं दर्ज की हैं, जिनमें 10 हत्याएं शामिल हैं। चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में जातीय अल्पसंख्यकों को क्रांति के बाद भी सुरक्षा बलों की ज्यादतियों का सामना करना पड़ा।”
रिपोर्ट में कहा गया कि बांग्लादेश में पहले दो महिला प्रधानमंत्री रह चुकी हैं और 2024 के छात्र आंदोलन में भी बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया था, इसके बावजूद महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बेहद सीमित है। आगामी आम चुनाव में 51 में से 30 राजनीतिक दलों ने एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारा है। इस्लामी राजनीतिक दल जमात-ए-इस्लामी ने अपने 276 उम्मीदवारों में से एक भी महिला को टिकट नहीं दिया।
कई रिपोर्टों ने इसे “शर्मनाक” बताते हुए कहा है कि फरवरी का चुनाव बांग्लादेश के इतिहास में महिला उम्मीदवारों की सबसे कम भागीदारी वाला चुनाव होगा। इस सप्ताह ढाका में ‘महिला उम्मीदवारों के नामांकन का संकट: दलों की प्रतिबद्धताओं और अमल के बीच अंतर और चुनाव आयोग की जवाबदेही’ विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि चुनाव आयोग भले ही “लैंगिक समावेशी चुनाव” की बात करता है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर नहीं दिखता।
यूनाइटेड न्यूज बांग्लादेश (यूएनबी) के अनुसार, इस कार्यक्रम में गोणोशास्थ्य अभियान, दुर्बार नेटवर्क फाउंडेशन, नागरिक कोएलिशन, नारी उद्योग केंद्र, नारी ग्रंथ प्रवर्तन, नारी संघति, नारी पक्ष, नारीर डाके राजनीति, फेमिनिस्ट एलायंस ऑफ बांग्लादेश, बांग्लादेश नारी मुक्ति केंद्र और वॉयस फॉर रिफॉर्म सहित कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
फोरम नेताओं ने महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का विरोध करते हुए कहा कि वे विशेष कोटे के जरिए संसद में प्रवेश नहीं चाहतीं, बल्कि सीधे चुनाव लड़कर योग्यता के आधार पर प्रतिनिधित्व चाहती हैं।
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