
Pakistan पाकिस्तान: खैबर पख्तूनख्वा (केपी) और बलूचिस्तान जैसे प्राकृतिक संसाधन संपन्न प्रांतों में अशांति बढ़ रही है। कारण यह है कि इस्लामाबाद इन इलाकों के खनिज संसाधनों पर अपने अधिकारों का इस्तेमाल इस तरह कर रहा है, जिससे प्रांतीय स्वायत्तता कमजोर हो रही है। यूरोपियन टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान में संसाधनों का प्रबंधन एक चेतावनी भरी कहानी बन चुका है। 2010 में पारित ऐतिहासिक 18वें संवैधानिक संशोधन ने प्रांतों को अधिक स्वायत्तता देने और प्राकृतिक संसाधनों पर संयुक्त अधिकार सुनिश्चित करने का वादा किया था। अनुच्छेद 172(3) के तहत केंद्र और प्रांतों के बीच संसाधनों का साझा स्वामित्व तय किया गया था। लेकिन पंद्रह साल बाद भी स्थिति अलग है। लेख में कहा गया है कि संघीय सरकार प्रांतीय अधिकारों के उल्लंघन और नियंत्रण के जरिए संसाधनों का दोहन कर रही है। संविधान में किए गए वादों और व्यवहारिक राजनीति के बीच यह विरोधाभास शासन संकट पैदा कर रहा है, जो पाकिस्तान की स्थिरता और आर्थिक भविष्य के लिए गंभीर खतरा है।
खैबर पख्तूनख्वा में संगमरमर, ग्रेनाइट, रत्न, क्रोमाइट और तांबे जैसे विशाल भंडार मौजूद हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे इस प्रांत का आर्थिक विकास तेज होना चाहिए था। लेकिन हकीकत यह है कि इन संसाधनों का दोहन तो हो रहा है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर निवेश बेहद कम है। बलूचिस्तान की स्थिति और भी गंभीर है। सोना, तांबा, कोयला और दुर्लभ मृदा तत्वों जैसे खनिजों से समृद्ध होने के बावजूद यह देश का सबसे गरीब और पिछड़ा प्रांत बना हुआ है। लेख के मुताबिक, संसाधनों की भरमार और स्थानीय गरीबी के बीच यह अंतर दशकों से चली आ रही शोषणकारी नीतियों का परिणाम है। यहां प्रांतीय हितों और स्थानीय लोगों की भलाई की बजाय संघीय और विदेशी हितों को तरजीह दी गई है। इन नीतियों से स्थानीय आबादी में असंतोष बढ़ रहा है और प्रांतों में राजनीतिक अस्थिरता गहराती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान ने संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और प्रांतीय स्वायत्तता के वादों का पालन नहीं किया तो इसका असर देश की सामाजिक एकता और आर्थिक भविष्य पर गंभीर रूप से पड़ेगा।





