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Afghanistan : अफगानिस्तान की आजादी के 102 साल पूरे हुए और तालिबान की जगह अफगानिस्तान का झंडा फहराया

Mohsin
19 Aug 2021 5:38 PM GMT
Afghanistan : अफगानिस्तान की आजादी के 102 साल पूरे हुए और तालिबान की जगह अफगानिस्तान का झंडा फहराया
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अमीरात शब्द अमीर से बना है,

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। अफगानिस्तान की आजादी के 102 साल पूरे होने के दिन एक तरफ लोग तालिबान की जगह अफगानिस्तान का झंडा फहरा रहे थे, तालिबानी नेतृत्व ने अफगानिस्तान में इस्लामिक अमीरात के गठन का ऐलान किया। अफगानिस्तान में इस्लामी अमीरात के गठन का अर्थ है कि यह एक इस्लामिक देश होगा जहां शरिया का कानून चलेगा। तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने कहा कि इस्लामिक अमीरात सभी देशों से अच्छे राजनयिक और व्यापारिक रिश्ते चाहता है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक इस्लामिक अमीरात के गठन के बाद अब इस देश में सत्ता चलाने के लिए तालिबान के प्रमुख नेताओं का एक परिषद बनाया जाएगा। इस परिषद का नेतृत्व तालिबान का सरगना हैबतुल्लाह अखुंदजादा करेगा। इसी के साथ ईरान की तरह ही अफगानिस्तान में भी एक सुप्रीम लीडर का पद होगा।

अमीरात शब्द अमीर से बना है, इस्लाम में अमीर का मतलब प्रमुख या प्रधान से होता है। इस अमीर के तहत जो भी जगह या शहर या देश आता है, वो अमीरात कहलाता है। इस तरह इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान का मतलब हुआ एक इस्लामिक देश। अभी अफगानिस्तान पर शासन के तरीके पर फैसला होना बाकी है, लेकिन इतना तय है कि अफगानिस्तान में कोई लोकतांत्रिक प्रणाली नहीं होगी। यहां सिर्फ शरिया कानून लागू होगा, और इस बारे में तालिबान पहले से ही स्पष्ट है।
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हैबतुल्लाह अखुंदजादा का जन्म 1961 में कंधार प्रांत में हुआ था। उसका संबंध नूरजई जनजाति से है। उसके पिता गांव के मस्जिद के इमाम थे। हैबतुल्लाह एक कट्टर धार्मिक नेता के रूप में पहचाना जाता है। 1980 के दशक में हैबतुल्लाह ने अफगानिस्तान में सोवियत सैन्य अभियान का विरोध किया और 1994 में वह तालिबान का सदस्य बना। फराह प्रांत पर तालिबान द्वारा कब्जा किए जाने के बाद, अखुंदजादा को क्षेत्र में अपराध से लड़ने का प्रभारी बनाया गया था। तालिबान ने 1996 में जब काबुल पर कब्जा किया था उस वक्त भी उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी थी। माना जाता है कि कई तालिबान नेताओं के विरोध के बाद भी अखुंदजादा अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान देश में रहा। तालिबान ने अखुंदजादा को अमीर-अल-मोमिनीन यानी वफादारों का कमांडर की उपाधि भी दी। धीरे-धीरे हैबतुल्लाह अखुंदजादा की ताकत तालिबान में बढ़ गयी और वह मई 2016 में अख्तर मंसूर के ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद वह इस आतंकवादी समूह का नेता बन गया।
एक सरदार या सैन्य कमांडर के बजाय उसकी एक धार्मिक नेता के रूप में ज्यादा पहचान है। वो शरिया कानून के संरक्षक के रूप में पहचाना जाता है और अफगानिस्तान के शरिया कोर्ट के हेड के रूप में भी काम कर चुका है। ये तालिबान के इस्लामी अदालतों का प्रमुख रहा है और वह तालिबान के सदस्यों के बीच धार्मिक मुद्दों को निपटाता है। हेबतुल्ला ही वह शख्स है, जिसने तालिबान के अधिकांश फतवे जारी किए। पत्थर से मारकर हत्या करने से लेकर महिला पर सख्ती से जुड़े कई फतवे इसी ने जारी किए हैं। 2017 में हेबतुल्ला अखुंदजादा का बेटा अब्दुर रहमान एक अफगान सैन्य अड्डे पर एक आत्मघाती हमले में मारा गया था।


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