प्रौद्योगिकी

Facebook, Instagram और YouTube पर बढ़ सकती है कानूनी जवाबदेही, सरकार कर रही नियमों में बदलाव पर विचार

jantaserishta.com
5 Nov 2026 3:42 PM IST
Facebook, Instagram और YouTube पर बढ़ सकती है कानूनी जवाबदेही, सरकार कर रही नियमों में बदलाव पर विचार
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जानें क्या होगा असर?
नई दिल्ली: केंद्र सरकार सोशल मीडिया कंपनियों की कानूनी जवाबदेही बढ़ाने के विकल्प पर विचार कर रही है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और X जैसे प्लेटफॉर्म्स को फिलहाल मिलने वाली 'सेफ हार्बर' सुरक्षा के दायरे में बदलाव किया जा सकता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (IT मंत्रालय) ने इस संबंध में मौजूदा नियमों की समीक्षा और संभावित बदलावों पर चर्चा शुरू की है।
अगर प्रस्ताव लागू होता है, तो सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर्स की ओर से पोस्ट किए गए वीडियो, कमेंट और अन्य सामग्री के लिए भी कानूनी जिम्मेदारी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, फिलहाल यह विचार-विमर्श के स्तर पर है। सरकार ने इस सुरक्षा को खत्म करने का कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया है।
क्या है सेफ हार्बर सुरक्षा और कंपनियों को इससे क्या फायदा?
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत इंटरनेट मध्यस्थों यानी इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म्स को कुछ शर्तों के साथ कानूनी संरक्षण मिलता है। इसे सेफ हार्बर कहा जाता है। इस प्रावधान के तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और X जैसी कंपनियों को यूजर्स की ओर से अपलोड की गई हर सामग्री के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता। यानी किसी व्यक्ति ने प्लेटफॉर्म पर कोई पोस्ट, वीडियो या कमेंट किया है, तो सामान्य परिस्थितियों में उसके लिए कंपनी पर उसी तरह मुकदमा नहीं चलाया जाता, जैसे उस सामग्री को खुद कंपनी ने प्रकाशित किया हो।
हालांकि, यह सुरक्षा पूरी तरह बिना शर्त नहीं है। कंपनियों को कानून और निर्धारित सरकारी निर्देशों का पालन करना होता है। नियमों का उल्लंघन करने या जरूरी कार्रवाई नहीं करने की स्थिति में उन्हें कानूनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
सरकार सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्ती क्यों चाहती है?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के भीतर यह विचार है कि सोशल मीडिया कंपनियों की भूमिका अब केवल यूजर्स की सामग्री को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने तक सीमित नहीं रह गई है। ये प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिदम के जरिए तय करते हैं कि किस यूजर को कौन-सी पोस्ट दिखाई जाएगी। कौन-सा वीडियो ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा और किस तरह की सामग्री की सिफारिश की जाएगी, इसमें भी उनकी तकनीक की अहम भूमिका होती है।
इसके अलावा कंपनियां अपनी कम्युनिटी गाइडलाइंस के आधार पर कंटेंट हटाने, सीमित करने या अकाउंट पर कार्रवाई करने का अधिकार रखती हैं। सरकार के कुछ अधिकारियों का मानना है कि जब कंपनियां सामग्री की पहुंच और दृश्यता को प्रभावित करती हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी उसी हिसाब से तय होनी चाहिए।
सेफ हार्बर का दायरा सीमित करने पर विचार
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार एक ऐसे विकल्प पर चर्चा कर रही है, जिसमें सेफ हार्बर का संरक्षण सोशल मीडिया कंपनियों के बजाय इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों, टेलीकॉम ऑपरेटरों और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स तक सीमित किया जा सकता है।
इसका मतलब यह होगा कि सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर्स की सामग्री के मामले में पहले जैसी कानूनी छूट नहीं मिलेगी। उन्हें प्लेटफॉर्म पर मौजूद कंटेंट को लेकर अधिक जवाबदेही उठानी पड़ सकती है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित बदलावों का अंतिम स्वरूप क्या होगा और किन कंपनियों पर कौन-से नियम लागू किए जाएंगे।
इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट का मामला
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने दिल्ली पुलिस को इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के कथित प्रचार के आरोपों की विस्तृत जांच करने को कहा था।
आरोप था कि मेटा के स्वामित्व वाले इंस्टाग्राम पर पेड विज्ञापनों के माध्यम से भारत में चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) को बढ़ावा दिया गया। आयोग ने पुलिस से यह भी जांचने को कहा कि क्या संबंधित टेक कंपनी और अन्य पक्षों ने POCSO कानून के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग से जुड़ी जिम्मेदारियों का पालन किया था। इस मामले में जांच के निर्देश दिए गए हैं। आरोपों को अभी साबित हुआ तथ्य नहीं माना जा सकता।
नियम बदले तो सोशल मीडिया कंपनियों पर क्या असर होगा?
यदि सरकार सेफ हार्बर सुरक्षा के दायरे में बदलाव करती है, तो सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में अपने काम करने के तरीके की समीक्षा करनी पड़ सकती है। उन्हें यूजर्स के कंटेंट की निगरानी, शिकायतों पर कार्रवाई और कानूनी अनुपालन के लिए ज्यादा संसाधन लगाने पड़ सकते हैं।
इस बदलाव का असर आम यूजर्स पर भी पड़ सकता है। कंपनियां कानूनी जोखिम कम करने के लिए विवादित या नियमों के खिलाफ मानी जाने वाली सामग्री पर जल्दी कार्रवाई कर सकती हैं। हालांकि, इससे अभिव्यक्ति की आजादी और कंटेंट हटाने के फैसलों में पारदर्शिता को लेकर भी बहस तेज हो सकती है। फिलहाल सरकार की चर्चा का नतीजा सामने आना बाकी है। इसलिए सोशल मीडिया कंपनियों की मौजूदा कानूनी सुरक्षा में बदलाव को अभी संभावित कदम के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
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