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स्टारलिंक से मुकाबले पर अंबानी की कंपनी का बड़ा बयान, ग्राहकों को होगा फायदा?
jantaserishta.com
16 Oct 2026 2:11 PM IST

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मुंबई: भारत में स्टारलिंक की शुरुआत को लेकर चल रही बहस के बीच रिलायंस इंडस्ट्रीज ने कहा है कि वह प्रतिस्पर्धा से नहीं डरती। यह प्रतिक्रिया इलॉन मस्क के उन आरोपों के बाद आई, जिनमें उन्होंने भारतीय टेलीकॉम कंपनियों पर स्टारलिंक की राह में रुकावट डालने का आरोप लगाया था। सरकार के मुताबिक, जियो सैटकॉम, वनवेब और स्टारलिंक को सैटेलाइट इंटरनेट के लिए लाइसेंस मिल चुके हैं, लेकिन सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम से जुड़ी शर्तें अभी पूरी होनी बाकी हैं।
स्टारलिंक विवाद पर रिलायंस का जवाब
इलॉन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी स्टारलिंक की भारत में एंट्री को लेकर चल रही बहस के बीच रिलायंस इंडस्ट्रीज ने शुक्रवार को अपनी प्रतिक्रिया दी। कंपनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करके कहा कि उसे प्रतिस्पर्धा से डर नहीं लगता। रिलायंस के मुताबिक, असली मुकाबला वही है जिसमें ग्राहकों को पता चले कि कौन बेहतर सेवा दे रहा है।
कंपनी का यह बयान मस्क के उन आरोपों के बाद आया है, जिनमें उन्होंने दावा किया था कि भारत की टेलीकॉम कंपनियां स्टारलिंक की लॉन्चिंग में बाधा डाल रही हैं। इस विवाद में रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी का नाम भी सामने आया है। मस्क पिछले कुछ दिनों से भारत में स्टारलिंक की शुरुआत में हो रही देरी को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणी कर रहे हैं। एक पोस्ट में उन्होंने मुकेश अंबानी को तंज कसते हुए ‘प्राइम मिनिस्टर अंबानी’ कहा था और उन्हें भारत का असली बॉस बताया था।
भारत में महंगे इंटरनेट प्लान को लेकर सवाल
स्टारलिंक की भारत में संभावित कीमत को लेकर भी चर्चा हो रही है। कुछ लोगों का कहना है कि भारत में मोबाइल इंटरनेट काफी सस्ती दरों पर उपलब्ध है। यहां 300 से 400 रुपये महीने में 60GB डेटा मिलने का उदाहरण दिया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर स्टारलिंक दूसरे देशों की तरह भारत में भी लगभग 2,200 रुपये महीने का शुल्क लेती है, तो उसके ग्राहक कौन होंगे।
इस तर्क के जवाब में मस्क ने कहा कि एक तरफ कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि स्टारलिंक भारत में जियो के सस्ते प्लान से मुकाबला नहीं कर पाएगी, वहीं दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि उसके आने से बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। मस्क के मुताबिक, इन दोनों बातों को एक साथ सही नहीं माना जा सकता।
स्टारलिंक की कीमत और भारतीय बाजार में उसकी मांग को लेकर अभी अंतिम तस्वीर स्पष्ट नहीं है। हालांकि, प्रतिस्पर्धा बढ़ने पर कंपनियों को अपनी सेवाओं और कीमतों पर ध्यान देना पड़ सकता है। स्टारलिंक के लिए भी भारतीय ग्राहकों की जरूरतों के मुताबिक प्लान पेश करना अहम होगा।
तीन कंपनियों को मिला लाइसेंस, लेकिन अभी बाकी हैं मंजूरियां
इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 में केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बताया कि भारत में तीन कंपनियों को सैटेलाइट इंटरनेट सेवा के लिए लाइसेंस दिए गए हैं। इनमें शामिल हैं:
- रिलायंस जियो सैटकॉम
- भारती एयरटेल के समर्थन वाली यूटेलसेट वनवेब
- इलॉन मस्क की स्टारलिंक
हालांकि, लाइसेंस मिलने का मतलब यह नहीं है कि ये कंपनियां तुरंत सेवाएं शुरू कर सकती हैं। सरकार के अनुसार, सुरक्षा संबंधी मंजूरियां अभी बाकी हैं। इसके अलावा सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल और उसकी कीमत तय करने से जुड़ा ढांचा भी तैयार किया जा रहा है। सभी जरूरी शर्तें पूरी होने के बाद ही कंपनियां भारत में अपनी सेवाएं शुरू कर सकेंगी।
स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा नियम क्यों हैं जरूरी?
सैटेलाइट इंटरनेट चलाने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी यानी स्पेक्ट्रम की जरूरत होती है। सरकार को तय करना होता है कि कंपनियों को स्पेक्ट्रम किस तरीके से दिया जाएगा और इसके लिए कितना शुल्क लिया जाएगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस चाहती थी कि स्पेक्ट्रम का आवंटन नीलामी के जरिए हो, जबकि एयरटेल और वनवेब सीधे आवंटन के पक्ष में थीं। अंततः सरकार ने टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 के तहत सीधे आवंटन का रास्ता चुना।
सुरक्षा भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। सरकार चाहती है कि सेवा देने वाली कंपनियां भारतीय कानूनों का पालन करें और जरूरत पड़ने पर संबंधित एजेंसियां कानूनी प्रक्रिया के तहत निगरानी तथा इंटरसेप्शन से जुड़े निर्देश लागू करा सकें। सैटेलाइट नेटवर्क का ढांचा सामान्य मोबाइल नेटवर्क से अलग होने के कारण इन शर्तों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी माना जा रहा है।
अंडमान और मणिपुर में मिले थे स्टारलिंक के उपकरण
साल 2024 में भारतीय एजेंसियों को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मादक पदार्थों की तस्करी की जांच के दौरान और मणिपुर में सेना के एक ऑपरेशन के समय स्टारलिंक के उपकरण मिले थे। उस समय मस्क ने कहा था कि स्टारलिंक की सेवा भारत में सक्रिय नहीं थी। उनका दावा था कि बरामद उपकरण स्टारलिंक के सैटेलाइट नेटवर्क का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे।
स्टारलिंक की किट में सैटेलाइट डिश, वाई-फाई राउटर, बिजली की आपूर्ति से जुड़ी केबल और उसे लगाने के लिए स्टैंड शामिल होते हैं। इंटरनेट कनेक्शन के लिए डिश को खुले आसमान की ओर रखना पड़ता है। कंपनी का ऐप सेटअप और नेटवर्क की निगरानी में मदद करता है।
स्टारलिंक लो अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट सेवा देती है। इसका उद्देश्य उन दूरदराज के इलाकों तक कनेक्टिविटी पहुंचाना है, जहां मोबाइल नेटवर्क या ब्रॉडबैंड की सुविधा उपलब्ध नहीं है। कंपनी 2021 से भारत में सेवा शुरू करने की कोशिश कर रही है। अब लाइसेंस मिलने के बाद भी उसकी शुरुआत सुरक्षा मंजूरी, स्पेक्ट्रम संबंधी व्यवस्था और अन्य जरूरी शर्तों पर निर्भर करेगी।
भारत में स्टारलिंक का प्रवेश होने पर सैटेलाइट इंटरनेट के क्षेत्र में जियो सैटकॉम और वनवेब जैसी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ सकतीहै। लेकिन ग्राहकों को कितनी कीमत चुकानी होगी और सेवा किन इलाकों में उपलब्ध होगी, यह कंपनी की अंतिम योजनाओं और सरकारी मंजूरियों के बाद ही साफ होगा।
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