
स्पोर्ट: खेलों में मेडल जीतना हर एथलीट के लिए सबसे खास और भावुक पल होता है। जब कोई खिलाड़ी पोडियम पर खड़ा होकर अपने गले में पड़े मेडल को दांतों से काटता हुआ नजर आता है तो यह तस्वीर अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है। ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स जैसे बड़े आयोजनों में यह दृश्य अब लगभग एक परंपरा बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर खिलाड़ी मेडल को दांतों से क्यों काटते हैं? क्या यह सिर्फ कैमरे के सामने एक स्टाइलिश पोज है या इसके पीछे कोई पुराना इतिहास छिपा है?
दरअसल, मेडल काटने की यह परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है। इसका संबंध पुराने समय में सोने की शुद्धता जांचने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। पहले के दौर में जब सोने के सिक्के और अन्य कीमती वस्तुएं बनाई जाती थीं, तब व्यापारी उनकी असली गुणवत्ता जांचने के लिए उन्हें दांतों से काटकर देखते थे। सोना एक नरम धातु होती है और उस पर दांतों का हल्का निशान पड़ सकता है। इससे यह पता लगाने की कोशिश की जाती थी कि सिक्का असली सोने का है या नहीं।
पुराने समय में सोने के सिक्कों की पहचान करने के लिए यह तरीका काफी प्रचलित था। यदि धातु पर काटने का निशान बन जाता था तो उसे शुद्ध सोना माना जाता था। यही वजह धीरे-धीरे खेलों की दुनिया में भी प्रतीक के रूप में शामिल हो गई। माना जाता है कि 1912 से पहले तक कुछ खेल प्रतियोगिताओं में विजेताओं को शुद्ध सोने के पदक दिए जाते थे। उस समय खिलाड़ी मेडल की जांच करने के लिए उसे दांत से काटते थे। बाद में जब असली सोने के पदक देने की परंपरा खत्म हो गई, तब भी यह अंदाज खिलाड़ियों के जश्न का हिस्सा बन गया।
हालांकि आज के समय में मेडल काटना केवल एक प्रतीकात्मक परंपरा है। आधुनिक खेलों में दिए जाने वाले गोल्ड मेडल पूरी तरह सोने के नहीं होते। इनमें सोने की केवल एक पतली परत चढ़ाई जाती है। उदाहरण के तौर पर कॉमनवेल्थ गेम्स के गोल्ड मेडल में लगभग 1 से 1.5 प्रतिशत तक ही असली सोना होता है। यह मुख्य रूप से चांदी से बना होता है, जिस पर सोने की प्लेटिंग की जाती है।
वहीं सिल्वर मेडल आमतौर पर स्टर्लिंग सिल्वर से बनाया जाता है, जबकि ब्रॉन्ज मेडल कांसे से तैयार किया जाता है। इसलिए आज खिलाड़ी मेडल काटकर उसकी शुद्धता जांचने की कोशिश नहीं करते, बल्कि यह जीत की खुशी जाहिर करने और ऐतिहासिक परंपरा को निभाने का एक तरीका बन चुका है।
मेडल बाइट की तस्वीरें खेल प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। कई बड़े खिलाड़ी अपनी जीत के बाद इसी अंदाज में फोटो खिंचवाते हैं। यह तस्वीर उनके संघर्ष, मेहनत और सफलता की यादगार बन जाती है। खिलाड़ियों के लिए यह पल सिर्फ एक फोटो नहीं बल्कि वर्षों की मेहनत और सपनों के पूरा होने का प्रतीक होता है।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भी कई भारतीय खिलाड़ी पदक जीतने के बाद इस परंपरा को निभाते नजर आ सकते हैं। इस प्रतियोगिता में भारत के कई एथलीट हिस्सा ले रहे हैं और उनकी कोशिश देश के लिए ज्यादा से ज्यादा पदक जीतने की है। जब कोई खिलाड़ी पोडियम पर खड़े होकर मेडल को दांत से पकड़ता है तो वह सिर्फ एक परंपरा नहीं निभा रहा होता, बल्कि खेल इतिहास से जुड़ी एक पुरानी कहानी को भी आगे बढ़ा रहा होता है।
आज भले ही मेडल काटने का कोई आधिकारिक नियम नहीं है, लेकिन यह खेल संस्कृति का एक खास हिस्सा बन चुका है। जीत की खुशी, ऐतिहासिक परंपरा और यादगार तस्वीर, इन तीनों का मेल ही इस छोटे से अंदाज को इतना खास बनाता है। यही कारण है कि दुनिया भर के खिलाड़ी मेडल जीतने के बाद इस अनोखे तरीके से अपनी सफलता का जश्न मनाते हैं।





