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नेशनल तैराक चाय बेचने को मजबूर, दुकान पर टंगे मेडल सरकार की नाकामी कर रहे उजागर

jantaserishta.com
22 Dec 2021 5:37 AM GMT
नेशनल तैराक चाय बेचने को मजबूर, दुकान पर टंगे मेडल सरकार की नाकामी कर रहे उजागर
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पटना: क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों का देश में हाल कितना बुरा है, यह किसी से छिपा नहीं है. मौजूदा समय में टेक्नोलॉजी के चलते नेशनल खेल हॉकी समेत कुछ स्पोर्ट्स और एथलीट्स का हाल थोड़ा ठीक हुआ है, लेकिन कुछ समय पहले नेशनल और इंटरनेशनल चैम्पियंस का हाल बहुत बुरा हुआ करता था. उन्हें चाय बेचने और मजदूरी करने के लिए बेबस होना पड़ता था. आज भी कुछ एथलीट्स ऐसे हैं, जो यही काम करके परिवार चला रहे हैं.

इनमें से ही एक हैं पटना के तैराक गोपाल प्रसाद यादव. उन्होंने नेशनल लेवल पर 5 मेडल जीते हैं, लेकिन वह चाय बेचने को मजबूर हैं. गोपाल 1988 और 1989 में स्विमिंग में चैम्पियन रह चुके हैं, लेकिन ना तो केंद्र और न ही बिहार सरकार ने उनकी सुध ली. काफी ठोकर खाने के बाद आज वे चाय दुकान चलाकर परिवार चलाते हैं.
गोपाल प्रसाद को आज तक सरकारी नौकरी नहीं मिली, जिसके कारण वे सड़क पर चाय बेचने को मजबूर हैं. उन्होंने 1988 और 1989 में तैराकी में 5 मेडल जीते थे, जो आज दुकान पर टांगकर रखते हैं. यह मेडल सरकार की नाकामी को उजागर करते हैं.
गोपाल प्रसाद दुकान पर अपने जीते हुए 5 मेडल टांगकर रखते हैं. बिहार में खिलाड़ी का क्या हश्र होता है यह बताने के लिए गोपाल ने दुकान पर मेडल टांग रखे हैं. उनका सपना है कि उनका बेटा इंटरनेशनल स्विमिंग में मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करे. हालांकि संसाधन की कमी के कारण गोपाल को काफी निराशा भी है.
बिहार के इस तैराक ने कहा, 'मुझे कोई शर्म महसूस नहीं होती....शर्म तो सरकार को करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि लालू की सरकार हो या नीतिश कुमार की, सब जगह गुहार लगा चुका हूं. वहां से सिर्फ आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला है.'
गोपाल अपनी दुकान पर 6 रुपए प्रति प्याली के हिसाब से चाय बेचते हैं. उन्होंने कहा कि जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी थी तो उन्हें एक आशा जगी थी कि प्रधानमंत्री एक चाय बेचने वाला बना है. अब जरूर उनका भाग्य बदलेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
गोपाल ने कहा कि 10 साल तक मोदी की टी-शर्ट पहनकर चाय बेची, लेकिन मेरा भाग्य वैसा का वैसा ही रहा. उनके अच्छे दिन नहीं आए. अब तेजस्वी यादव और तेज प्रताप की टी-शर्ट पहनते हैं और चाय बेचते हैं, हो सकता है कि आने वाले दिन में कहीं इनकी सरकार बनेगी तो शायद मेरे भी दिन सुधरेंगे.
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