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एशियन गेम्स 2026। जापान के आइची-नागोया में एशियाई खेलों का समापन भारत के लिए कई उपलब्धियों के साथ कुछ अहम सवाल भी छोड़ गया है। भारतीय खिलाड़ियों ने अलग-अलग खेलों में अपनी प्रतिभा और क्षमता का प्रदर्शन किया, लेकिन पदकों की कुल तस्वीर ने खेल व्यवस्था और तैयारियों को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है। खिलाड़ियों की तैयारी पर रिकॉर्ड करीब 800 करोड़ रुपये का निवेश, बेहतर प्रशिक्षण, विदेशी एक्सपोजर और उच्चस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद भारत का पदक ग्राफ पिछले हांगझू एशियाई खेलों के ऐतिहासिक प्रदर्शन से नीचे चला गया।
हांगझू एशियाई खेल भारत के लिए बेहद खास रहे थे। वहां भारतीय दल ने कई खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए नया इतिहास रचा था। इसके बाद उम्मीद बढ़ गई थी कि अगले एशियाई खेलों में भारतीय खिलाड़ी इस प्रदर्शन को न केवल बरकरार रखेंगे, बल्कि इससे आगे निकलने की कोशिश करेंगे। इसी लक्ष्य के साथ खिलाड़ियों की तैयारियों और सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके बावजूद आइची-नागोया में पदक ग्राफ का नीचे जाना अब समीक्षा का विषय बन गया है।
भारतीय खेलों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं देने पर लगातार जोर दिया गया है। बड़े टूर्नामेंट से पहले खिलाड़ियों के लिए प्रशिक्षण शिविर, विदेशी कोच, खेल विज्ञान से जुड़ी सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भागीदारी जैसे कई कदम उठाए जाते रहे हैं। आइची-नागोया एशियाई खेलों से पहले भी खिलाड़ियों की तैयारियों को मजबूत बनाने के लिए बड़े स्तर पर संसाधन उपलब्ध कराए गए।
करीब 800 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड निवेश ने इस बार अपेक्षाओं को और बढ़ा दिया था। इतनी बड़ी राशि खर्च किए जाने के पीछे उद्देश्य यही था कि भारतीय खिलाड़ियों को तैयारी के स्तर पर किसी तरह की कमी का सामना न करना पड़े। प्रशिक्षण से लेकर उपकरण और विदेशी एक्सपोजर तक खिलाड़ियों को बेहतर अवसर देने की कोशिश की गई। यही कारण है कि खेलों के बाद पदक संख्या की तुलना निवेश और उपलब्ध सुविधाओं से की जा रही है।
हालांकि खेलों में केवल आर्थिक निवेश ही पदक की गारंटी नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबले लगातार कठिन होते जा रहे हैं। एशिया के कई देश खेलों में बड़े स्तर पर निवेश कर रहे हैं और नई प्रतिभाओं को तैयार करने के लिए लंबी अवधि की योजनाओं पर काम कर रहे हैं। ऐसे में भारत को भी केवल एक बड़े आयोजन की तैयारी के बजाय लगातार मजबूत खिलाड़ी तैयार करने की व्यवस्था पर ध्यान देना होगा।
आइची-नागोया के प्रदर्शन का विश्लेषण करते समय यह भी देखना जरूरी होगा कि किन खेलों में भारत उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया और किन स्पर्धाओं में नए खिलाड़ियों ने सकारात्मक संकेत दिए। पदक तालिका केवल अंतिम नतीजा बताती है, लेकिन इसके पीछे खिलाड़ियों की तैयारी, फिटनेस, प्रतियोगिता का स्तर और मुकाबले के दिन का प्रदर्शन जैसे कई पहलू काम करते हैं।
भारतीय खेल व्यवस्था के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बड़े निवेश को पदकों में बदलने की प्रक्रिया को और प्रभावी कैसे बनाया जाए। खिलाड़ियों को विदेशी एक्सपोजर और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण देने के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें सही समय पर सही प्रतियोगिताओं में खेलने का मौका मिले। इसके अलावा प्रदर्शन की नियमित समीक्षा भी जरूरी है, ताकि किसी बड़ी प्रतियोगिता से ठीक पहले कमियों का पता चलने के बजाय उन्हें पहले ही दूर किया जा सके।
हांगझू में भारत के ऐतिहासिक प्रदर्शन ने खेल प्रेमियों की उम्मीदों को नई ऊंचाई दी थी। जब कोई देश एक बार अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है तो अगली प्रतियोगिता में स्वाभाविक रूप से उससे बेहतर परिणाम की उम्मीद की जाती है। यही दबाव आइची-नागोया में भारतीय दल पर भी रहा। हालांकि हर बड़े आयोजन में परिस्थितियां अलग होती हैं और पिछले रिकॉर्ड को दोहराना आसान नहीं होता।
इसके बावजूद रिकॉर्ड निवेश के बाद पदक ग्राफ में गिरावट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसका मतलब यह नहीं है कि खिलाड़ियों पर किया गया खर्च बेकार गया, बल्कि यह इस बात की जरूरत बताता है कि पूरे सिस्टम की समीक्षा की जाए। यह समझना होगा कि निवेश का कितना हिस्सा सीधे खिलाड़ियों की तैयारियों तक पहुंचा, किन योजनाओं का वास्तविक फायदा मिला और किन क्षेत्रों में सुधार की गुंजाइश बनी हुई है।
भारत के लिए सकारात्मक पक्ष यह है कि देश में खेलों को लेकर माहौल तेजी से बदल रहा है। युवा खिलाड़ी कई ऐसी स्पर्धाओं में आगे आ रहे हैं, जिनमें पहले भारत की मौजूदगी सीमित मानी जाती थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ भारतीय खिलाड़ियों के लिए भी बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाओं का दायरा बढ़ा है। अब चुनौती इन सुविधाओं को लगातार बेहतर नतीजों में बदलने की है।
खेल विशेषज्ञों और संबंधित संस्थाओं के लिए आइची-नागोया के नतीजे भविष्य की रणनीति तैयार करने का आधार बन सकते हैं। जिन खेलों में प्रदर्शन कमजोर रहा, वहां खिलाड़ियों की तैयारी से लेकर कोचिंग व्यवस्था तक हर पहलू को समझना जरूरी होगा। वहीं जिन स्पर्धाओं में भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया, उनके सफल मॉडल को दूसरे खेलों में भी अपनाने की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है।
बड़े खेल आयोजनों में सफलता के लिए प्रतिभा की पहचान भी महत्वपूर्ण होती है। युवा खिलाड़ियों को शुरुआती स्तर पर ही बेहतर प्रशिक्षण, पोषण, फिटनेस और प्रतियोगिता का अनुभव मिले तो भविष्य में उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए केवल शीर्ष खिलाड़ियों पर खर्च करने के साथ जमीनी स्तर पर मजबूत खेल ढांचा तैयार करना भी जरूरी है।
आइची-नागोया एशियाई खेल भारत के लिए केवल पदकों का हिसाब नहीं हैं। ये नतीजे यह समझने का अवसर भी देते हैं कि भारतीय खेल व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ रही है। रिकॉर्ड निवेश और बेहतर सुविधाओं के बाद भी हांगझू के प्रदर्शन से पीछे रहना निश्चित रूप से समीक्षा की मांग करता है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि इन नतीजों से क्या सबक लिया जाता है। खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं देने की प्रक्रिया जारी रखते हुए प्रशिक्षण, चयन, फिटनेस, खेल विज्ञान और प्रदर्शन की निगरानी को और मजबूत करना होगा। हांगझू ने भारत को दिखाया था कि बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। आइची-नागोया का प्रदर्शन अब यह याद दिलाता है कि उस सफलता को लगातार बनाए रखने के लिए केवल निवेश नहीं, बल्कि उसकी सही योजना और प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है।
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