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मैदान पर हैंडशेक और देशभक्ति क्या है पूरा विवाद

Ratna Netam
14 Sept 2026 6:21 PM IST
मैदान पर हैंडशेक और देशभक्ति क्या है पूरा विवाद
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नई दिल्ली : क्रिकेट का मुकाबला खत्म होता है। जीत और हार का फैसला हो चुका होता है। आम तौर पर इसके बाद दोनों टीमों के खिलाड़ी एक-दूसरे के पास जाते हैं, हाथ मिलाते हैं और मैदान से लौट जाते हैं। इसे खेल भावना का सामान्य हिस्सा माना जाता है। लेकिन जब मैदान पर भारत और पाकिस्तान आमने-सामने हों तो यही सामान्य-सी प्रक्रिया कई बार बड़ी बहस में बदल जाती है। खिलाड़ी ने हाथ मिलाया या नहीं मिलाया, किसकी तरफ देखा, किससे बात की और किससे दूरी बनाई—इन बातों पर भी चर्चा होने लगती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या क्रिकेट में विरोधी टीम के खिलाड़ी से हाथ मिलाना या नहीं मिलाना देशभक्ति का पैमाना हो सकता है? क्या मैदान पर किया गया हर व्यवहार राष्ट्रीय नीति का प्रतीक माना जाना चाहिए? या फिर खेल के मैदान पर होने वाली चीजों को खेल भावना और उस समय की परिस्थितियों के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित है?
भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट कभी केवल बल्ले और गेंद का मुकाबला नहीं रहा। दोनों देशों के ऐतिहासिक और राजनीतिक संबंधों के कारण मैचों को सामान्य मुकाबलों से कहीं ज्यादा भावनात्मक नजरिए से देखा जाता है। यही कारण है कि भारत-पाकिस्तान मैच से पहले से लेकर मैच खत्म होने तक खिलाड़ियों की छोटी-छोटी गतिविधियां भी चर्चा का विषय बन जाती हैं।
सामान्य क्रिकेट मुकाबलों में मैच खत्म होने के बाद खिलाड़ियों का हाथ मिलाना एक स्थापित परंपरा है। इसका अर्थ यह नहीं होता कि दोनों खिलाड़ी मैदान के बाहर हर मुद्दे पर एक-दूसरे से सहमत हैं। यह केवल इस बात का संकेत होता है कि मैदान पर मुकाबला खत्म हो चुका है और दोनों पक्ष खेल के परिणाम का सम्मान करते हैं।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खिलाड़ी केवल निजी व्यक्ति नहीं होते। वे अपनी राष्ट्रीय टीम की जर्सी पहनकर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। इसी वजह से उनका व्यवहार कई बार व्यक्तिगत पसंद से आगे बढ़कर प्रतीकात्मक महत्व हासिल कर लेता है। खासकर ऐसे समय में जब दो देशों के संबंध तनावपूर्ण हों, मैदान पर किया गया छोटा सा इशारा भी राजनीतिक अर्थों में देखा जाने लगता है।
यहीं से बहस शुरू होती है। एक पक्ष का मानना हो सकता है कि गंभीर तनाव की परिस्थितियों में विरोधी देश की टीम से सामान्य व्यवहार करना उचित नहीं है। इस सोच के समर्थकों के लिए खेल और राष्ट्रीय भावना को पूरी तरह अलग करना संभव नहीं है। उनका तर्क हो सकता है कि जब खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है तो उसे देश में मौजूद भावनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।
दूसरी तरफ यह तर्क भी दिया जाता है कि किसी विरोधी टीम के खिलाड़ी से हाथ मिलाना उस देश की सरकार की नीतियों का समर्थन नहीं है। अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी एक-दूसरे से मुकाबला करते हैं और उसके बाद खेल भावना के तहत अभिवादन करते हैं। इसे राजनीतिक समर्थन या राष्ट्रीय निष्ठा से जोड़ना खेल की मूल भावना को जरूरत से ज्यादा राजनीतिक बना सकता है।
सवाल यह भी है कि अगर किसी खिलाड़ी के हाथ मिलाने को देशभक्ति की कसौटी बनाया जाए तो इसकी सीमा आखिर कहां तय होगी? क्या विरोधी खिलाड़ी से बात करना भी उसी नजरिए से देखा जाएगा? क्या मैच के दौरान चोट लगने पर उसकी मदद करना गलत माना जाएगा? क्या मैच के बाद जर्सी बदलना या किसी शानदार प्रदर्शन की तारीफ करना भी राजनीतिक संदेश बन जाएगा?
खेल के मैदान पर प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत सम्मान एक साथ मौजूद हो सकते हैं। दुनिया के कई बड़े खेल मुकाबलों में खिलाड़ी मैदान पर पूरी ताकत से एक-दूसरे के खिलाफ खेलते हैं लेकिन मुकाबला समाप्त होने के बाद एक-दूसरे के प्रदर्शन का सम्मान करते हैं। यही खेल भावना की बुनियादी अवधारणा है।
भारत-पाकिस्तान क्रिकेट की परिस्थिति हालांकि सामान्य मुकाबलों से अलग है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय क्रिकेट लंबे समय से सीमित रहा है और मुकाबले मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में होते हैं। ऐसे में जब भी दोनों टीमें आमने-सामने आती हैं तो करोड़ों दर्शकों की नजर मैदान पर रहती है। सोशल मीडिया ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है।
अब मैच का कोई पांच या दस सेकंड का वीडियो क्लिप कुछ ही मिनटों में वायरल हो सकता है। बिना पूरे संदर्भ के वही वीडियो अलग-अलग दावों के साथ साझा किया जाता है। खिलाड़ी की बॉडी लैंग्वेज तक का विश्लेषण शुरू हो जाता है। किसी सामान्य व्यवहार को दोस्ती का संदेश बताया जाता है तो किसी दूरी को राष्ट्रीय रुख के तौर पर पेश किया जाता है।
यह स्थिति खिलाड़ियों के लिए भी आसान नहीं है। उनसे एक तरफ शानदार प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है और दूसरी तरफ मैदान पर उनके हर व्यवहार को राष्ट्रीय भावना के चश्मे से देखा जाता है। खेल के दबाव के साथ इस तरह का अतिरिक्त सामाजिक और राजनीतिक दबाव उनके फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। यदि किसी टीम, क्रिकेट बोर्ड या संबंधित प्राधिकरण ने किसी खास परिस्थिति में औपचारिक प्रोटोकॉल तय किया है तो खिलाड़ियों से उसका पालन करने की अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन जहां ऐसा कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है, वहां खिलाड़ी के व्यक्तिगत व्यवहार को तुरंत देशभक्ति या देशविरोध का प्रमाण मानना अतिशयोक्ति हो सकती है।
देशभक्ति का अर्थ केवल सार्वजनिक प्रतीकों से तय नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी के लिए देश का प्रतिनिधित्व करना, मैदान पर अपना सर्वश्रेष्ठ देना और टीम के लिए पूरी प्रतिबद्धता से खेलना भी राष्ट्रीय जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी खिलाड़ी की देश के प्रति निष्ठा का फैसला केवल इस आधार पर करना कि उसने मैच के बाद किससे हाथ मिलाया, बेहद संकीर्ण कसौटी साबित हो सकती है।
इसके साथ यह भी स्वीकार करना होगा कि खेल पूरी तरह राजनीति से अलग नहीं रहता। इतिहास में कई बार देशों ने खेल प्रतियोगिताओं का बहिष्कार किया है, कूटनीतिक तनाव के कारण द्विपक्षीय मुकाबले रोके गए हैं और राष्ट्रीय नीतियों का असर खेल संबंधों पर पड़ा है। इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि खेल और राजनीति का कभी कोई संबंध ही नहीं होता।
असली सवाल शायद हाथ मिलाने से बड़ा है। सवाल यह है कि किसी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी से हम किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। क्या वह केवल एक खिलाड़ी है या हर समय देश की राजनीतिक भावनाओं का प्रतिनिधि भी है? इसका जवाब परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।
भारत और पाकिस्तान जैसे संवेदनशील मुकाबलों में खिलाड़ियों के व्यवहार पर बहस आगे भी होती रहेगी। लेकिन असहमति के बीच यह फर्क बनाए रखना जरूरी है कि मैदान पर प्रतिद्वंद्वी का सम्मान करना और किसी देश की नीति का समर्थन करना दो अलग बातें हैं।
मैच खत्म होने के बाद हाथ मिलाना खेल भावना का हिस्सा हो सकता है और किसी विशेष परिस्थिति में उससे दूरी बनाना प्रतीकात्मक संदेश भी हो सकता है। लेकिन इन दोनों में से किसी एक व्यवहार को अपने आप देशभक्ति का अंतिम प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा। आखिरकार देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ी की पहचान उसके प्रदर्शन, अनुशासन और जिम्मेदारी से भी तय होती है—सिर्फ मैच खत्म होने के बाद के कुछ सेकंड से नहीं।
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