हार के करीब से जीत तक, बाथरूम ब्रेक ने बदली नोस्कोवा की किस्मत

लंदन, एपी। विंबलडन महिला सिंगल्स के फाइनल में लिंडा नोस्कोवा ने ऐसा कमबैक किया, जिसने टेनिस जगत को हैरान कर दिया। मुकाबले के दौरान जब 21 वर्षीय चेक खिलाड़ी लगातार पांच मैच प्वाइंट गंवा चुकी थीं, तब किसी को उम्मीद नहीं थी कि वह वापसी करते हुए इतिहास रच देंगी। लेकिन एक छोटे से बाथरूम ब्रेक ने उन्हें नई ऊर्जा और आत्मविश्वास दिया, जिसके बाद उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए खिताब अपने नाम कर लिया।
लिंडा नोस्कोवा ने फाइनल मुकाबले में अपनी हमवतन करोलिना मुचोवा को 6-2, 5-7, 6-3 से हराकर करियर का पहला ग्रैंडस्लैम खिताब जीता। यह जीत उनके लिए इसलिए भी खास रही क्योंकि उन्होंने मुश्किल परिस्थिति से निकलकर मुकाबले को अपने पक्ष में किया।
मैच की शुरुआत से ही नोस्कोवा ने आक्रामक खेल दिखाया। उन्होंने पहला सेट 6-2 से आसानी से अपने नाम कर लिया। इसके बाद दूसरे सेट में करोलिना मुचोवा ने शानदार वापसी की और नोस्कोवा पर दबाव बनाते हुए सेट 5-7 से जीत लिया। तीसरे सेट में मुकाबला बेहद रोमांचक हो गया।
निर्णायक सेट में नोस्कोवा एक समय दबाव में नजर आईं। उन्होंने लगातार पांच मैच प्वाइंट गंवा दिए थे और ऐसा लग रहा था कि मुकाबला उनके हाथ से निकल सकता है। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और बाथरूम ब्रेक लिया। इसी दौरान उन्हें ऐसा पल मिला, जिसने उनके अंदर जीत का जज्बा और मजबूत कर दिया।
नोस्कोवा ने मैच के बाद बताया कि बाथरूम जाते समय उनकी नजर विंबलडन की प्रतिष्ठित ट्रॉफियों पर पड़ी। उन्होंने वहां रखी वीनस रोजवाटर डिश और उपविजेता ट्रॉफी को देखा। उस पल उन्होंने खुद से कहा कि वह सिर्फ छोटी ट्रॉफी नहीं बल्कि बड़ी ट्रॉफी लेकर जाना चाहती हैं।
उन्होंने कहा कि अगर वह इस मौके पर हार जातीं तो यह उनके करियर का सबसे बड़ा दर्द होता। इसी सोच के साथ वह कोर्ट पर लौटीं और तीसरे सेट में पूरी ताकत के साथ खेलते हुए मुकाबला अपने नाम कर लिया।
लिंडा नोस्कोवा की यह जीत उनके करियर का सबसे बड़ा पड़ाव है। इससे पहले वह बड़े टूर्नामेंटों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी थीं, लेकिन ग्रैंडस्लैम खिताब जीतने का सपना अब जाकर पूरा हुआ है।
दूसरी ओर, करोलिना मुचोवा ने भी फाइनल में शानदार संघर्ष किया। दूसरे सेट में उन्होंने जिस तरह वापसी की, उसने मुकाबले को रोमांचक बना दिया था। हालांकि तीसरे सेट में नोस्कोवा ने दबाव को बेहतर तरीके से संभाला और जीत हासिल कर ली।
21 साल की उम्र में विंबलडन खिताब जीतकर नोस्कोवा ने अपना नाम टेनिस इतिहास में दर्ज करा लिया है। उनकी इस जीत को मानसिक मजबूती और मुश्किल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
नोस्कोवा के लिए यह सिर्फ एक खिताबी जीत नहीं बल्कि उस विश्वास की जीत है, जो उन्होंने हार के करीब पहुंचने के बाद भी बनाए रखा। बाथरूम ब्रेक के दौरान मिली प्रेरणा ने उन्हें नया आत्मविश्वास दिया और आखिरकार उन्होंने विंबलडन की प्रतिष्ठित ट्रॉफी अपने हाथों में उठा ली।





