
Sport: फीफा विश्व कप 2026 को लेकर फुटबॉल में तकनीक का इस्तेमाल एक नए स्तर पर पहुंच गया है. पेनाल्टी शूटआउट जैसे निर्णायक पलों में सबसे बेहतर खिलाड़ी कौन होगा, इसका अनुमान अब केवल खेल कौशल से नहीं बल्कि दिमाग की गतिविधियों से लगाया जा रहा है. अमेरिकी पुरुष फुटबॉल टीम ने इस दिशा में जर्मनी की न्यूरोसाइंस कंपनी न्यूरो-11 के साथ साझेदारी की है. इसका उद्देश्य ऐसे खिलाड़ियों की पहचान करना है जो दबाव की स्थिति में भी स्थिर रहकर बेहतर प्रदर्शन कर सकें.
इस प्रक्रिया में खिलाड़ियों की मानसिक गतिविधियों का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जा रहा है. अभ्यास सत्रों के दौरान खिलाड़ियों को ईईजी (इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी) उपकरण पहनाए जाते हैं, जो उनके मस्तिष्क की विद्युत तरंगों को रिकॉर्ड करते हैं. जब खिलाड़ी पेनाल्टी या फ्री-किक जैसी स्थितियों का अभ्यास करते हैं, तब वैज्ञानिक यह देखते हैं कि उनके दिमाग का कौन सा हिस्सा अधिक सक्रिय है और वे तनाव में कैसे प्रतिक्रिया देते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, दबाव के समय कुछ खिलाड़ियों में निर्णय लेने और चिंता से जुड़े मस्तिष्कीय हिस्से अधिक सक्रिय हो जाते हैं, जिससे उनका प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है. वहीं कुछ खिलाड़ी ऐसे भी होते हैं जो तनाव के बावजूद शांत रहते हैं और अपनी सामान्य क्षमता बनाए रखते हैं. इसी आधार पर संभावित पेनाल्टी शूटर की सूची तैयार की जाती है.
यह प्रयोग केवल राष्ट्रीय टीमों तक सीमित नहीं है. इससे पहले क्लब फुटबॉल में भी इसका उपयोग किया जा चुका है. इंग्लैंड के क्लब लिवरपूल ने न्यूरो-11 के साथ मिलकर इस तकनीक का इस्तेमाल किया था. रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रक्रिया से खिलाड़ियों के आत्मविश्वास और मानसिक तैयारी में सुधार देखने को मिला और एक बड़े फाइनल में टीम ने लगातार पेनाल्टी सफलतापूर्वक गोल में बदली थीं.
फुटबॉल में अब डेटा और तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ रही है. फिटनेस ट्रैकिंग, वीडियो एनालिसिस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बाद अब न्यूरोसाइंस भी टीम चयन का हिस्सा बन रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में खिलाड़ियों के मानसिक प्रदर्शन का विश्लेषण रणनीति और चयन प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाएगा.





