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बैडमिंटन: फुर्ती और सटीकता का खेल, जिसने ओलंपिक में जमाई धाक

jantaserishta.com
16 Nov 2025 3:30 PM IST
बैडमिंटन: फुर्ती और सटीकता का खेल, जिसने ओलंपिक में जमाई धाक
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नई दिल्ली: बैडमिंटन एक ऐसा रोमांचक खेल है, जिसमें खिलाड़ी की गति, फुर्ती और सटीकता दर्शकों का उत्साह बढ़ाती है। आज यह खेल बहुत लोकप्रिय है और ओलंपिक में अपनी छाप छोड़ चुका है।
भले ही बैडमिंटन का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है, लेकिन इसका आधुनिक रूप भारत के 'पूना' खेल से विकसित हुआ। ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने भारत के पुणे शहर में इस खेल को शुरू किया था। यही वजह रही कि इसे 'पूना' नाम दिया गया।
1873 में अंग्रेज सैनिक इस खेल को अपने देश ले गए। 'ड्यूक ऑफ ब्यूफोर्ट' ने ब्रिटेन में इस खेल का एक संस्करण पेश किया। ड्यूक ऑफ ब्यूफोर्ट का निवास ग्लूस्टरशायर में स्थित 'बैडमिंटन हाउस' था। ऐसे में उन्होंने इस खेल को अपने घर के नाम पर 'बैडमिंटन' नाम दिया।
साल 1877 में बाथ बैडमिंटन क्लब ने इस खेल के लिए लिखित नियमों का पहला सेट तैयार किया और साल 1893 में इंग्लैंड में बैडमिंटन संघ की स्थापना हुई, जिसने इसके आधुनिक नियमों को संहिताबद्ध किया। करीब 16 साल बाद वर्ष 1899 में पहली ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप का आयोजन हुआ, लेकिन ओलंपिक तक पहुंच बनाने में इस खेल को लंबा इंतजार करना पड़ा।
ओलंपिक में पहली बार साल 1972 में एक प्रदर्शनी खेल के रूप में इसकी शुरुआत हुई। 1992 बार्सिलोना ओलंपिक में इसे पुरुष और महिला एकल और युगल स्पर्धाओं के साथ एक आधिकारिक ओलंपिक खेल बनाया गया। 1996 अटलांटा ओलंपिक में मिश्रित स्पर्धाओं की शुरुआत हुई।
कोर्ट पर खेले जाने बैडमिंटन में 'बेस्ट ऑफ थ्री गेम' खेले जाते हैं, जिसमें प्रत्येक खिलाड़ी या टीम 21 अंक हासिल करते हुए गेम अपने नाम करता है। इसके लिए लिए दो अंकों का अंतर अनिवार्य है। हालांकि, अगर दोनों खिलाड़ी 29-29 अंक तक पहुंच जाएं, तो गेम में अगला अंक जो खिलाड़ी हासिल करेगा, वो गेम जीत लेगा। इसे 'डेथ प्वाइंट' कहा जाता है।
दीपांकर भट्टाचार्य, मधुमिता बिष्ट, सैयद मोदी, पुलेला गोपीचंद, प्रकाश पादुकोण के दौर ने भारत में बैडमिंटन की लोकप्रियता बढ़ी। 1992 बार्सिलोना ओलंपिक में दीपांकर भट्टाचार्य पुरुष एकल में तीसरे दौर तक पहुंचे, जबकि मधुमिता बिष्ट महिला एकल स्पर्धा में दूसरे दौर में जगह बनाई। 2000 सिडनी ओलंपिक में पुलेला गोपीचंद ने ओलंपिक डेब्यू में ही अंतिम 16 में जगह बनाई। 2004 एथेंस ओलंपिक में अपर्णा पोपट और निखिल कनेटकर को महिला और पुरुष एकल के प्री-क्वार्टर फाइनल में शिकस्त झेलनी पड़ी। 2008 बीजिंग ओलंपिक में साइना नेहवाल क्वार्टर फाइनल तक पहुंचने वाली पहली भारतीय बनीं, लेकिन अनूप श्रीधर पुरुष एकल के दूसरे दौर से बाहर हो गए।
आखिरकार, साल 2012 में साइना नेहवाल ने ब्रॉन्ज जीतकर भारत को बैडमिंटन में पहला ओलंपिक मेडल दिलाया। इसके बाद 2016 रियो ओलंपिक में पीवी सिंधु ने सिल्वर मेडल अपेन नाम किया और फिर 2020 टोक्यो ओलंपिक में उन्होंने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया।
पीवी सिंधु बैडमिंटन में दो ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय शटलर बनीं। 2024 ओलंपिक में लक्ष्य सेन सेमीफाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय पुरुष एकल शटलर बने। ओलंपिक में भारत का इस खेल में गौरवशाली इतिहास रहा है। वर्ल्ड-क्लास ट्रेनिंग सुविधाएं, बेहतरीन कोचिंग स्टैंडर्ड और सरकार के समर्थन ने इस खेल में भारत की उम्मीदों को बढ़ाया है। अगर युवा खिलाड़ियों का प्रदर्शन इसी तरह निखरता रहा, तो भारतीय शटलर ओलंपिक में अधिक से अधिक पदक देश को दिला सकते हैं।
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