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कॉमनवेल्थ गेम्स में अजय बाबू का ऐतिहासिक प्रदर्शन

Kavita2
28 July 2026 4:44 PM IST
कॉमनवेल्थ गेम्स में अजय बाबू का ऐतिहासिक प्रदर्शन
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ग्लासगो : भारतीय वेटलिफ्टर वल्लुरी अजय बाबू ने कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए इतिहास रच दिया। पुरुषों के 79 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग फाइनल में 21 वर्षीय अजय बाबू ने सिल्वर मेडल अपने नाम किया। अपने पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा ले रहे अजय ने गोल्ड मेडल के लिए कड़ी चुनौती पेश की, लेकिन वह मलेशिया के एरी हिदायत मुहम्मद से सिर्फ 1 किलोग्राम के अंतर से पीछे रह गए।

अजय बाबू का यह प्रदर्शन भारतीय वेटलिफ्टिंग के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। कम उम्र में ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी क्षमता साबित की और अपने पहले ही कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया।

फाइनल मुकाबले में अजय बाबू और मलेशिया के एरी हिदायत मुहम्मद के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। दोनों खिलाड़ियों ने शुरुआत से ही शानदार प्रदर्शन किया और गोल्ड मेडल के लिए एक-दूसरे को कड़ी टक्कर दी। अंतिम प्रयासों तक मुकाबला बेहद रोमांचक बना रहा, लेकिन आखिर में अजय बाबू मामूली अंतर से पीछे रह गए और उन्हें सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा।

अजय बाबू की इस सफलता की कहानी उनके परिवार की खेल परंपरा से भी जुड़ी हुई है। उनके पिता वल्लुरी श्रीनिवास राव भी एक पेशेवर वेटलिफ्टर रह चुके हैं। उन्होंने 2010 में नई दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

वल्लुरी श्रीनिवास राव ने अपने करियर के दौरान वेटलिफ्टिंग में महत्वपूर्ण योगदान दिया और अपने क्षेत्र में इस खेल को बढ़ावा देने वाले प्रमुख लोगों में शामिल रहे। उन्होंने 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। अब 16 साल बाद उनके बेटे अजय बाबू ने उनसे आगे बढ़ते हुए सिल्वर मेडल जीतकर परिवार की खेल विरासत को और मजबूत किया है।

अजय बाबू की उपलब्धि को परिवार और क्षेत्र के लिए गर्व का क्षण माना जा रहा है। पिता से मिली प्रेरणा और वर्षों की मेहनत के दम पर अजय ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।

वेटलिफ्टिंग जैसे खेल में सफलता के लिए लंबे समय तक कठिन प्रशिक्षण, अनुशासन और मानसिक मजबूती की जरूरत होती है। अजय बाबू ने इन सभी चुनौतियों का सामना करते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाई।

उनकी सफलता युवा खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा बनी है। खासतौर पर उन खिलाड़ियों के लिए जो छोटे शहरों और सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने का सपना देखते हैं।

भारतीय वेटलिफ्टिंग ने पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। अजय बाबू का सिल्वर मेडल इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।

अजय बाबू ने अपने प्रदर्शन से यह साबित कर दिया कि मेहनत, सही मार्गदर्शन और खेल के प्रति समर्पण से बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। उनके पिता की उपलब्धियों से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की और अब कॉमनवेल्थ गेम्स के मंच पर देश के लिए पदक जीतकर एक नई पहचान बनाई है।

खेल प्रेमियों और विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अजय बाबू आने वाले वर्षों में भारत के लिए और भी बड़ी उपलब्धियां हासिल करेंगे। उनकी यह सफलता न केवल उनके परिवार बल्कि भारतीय वेटलिफ्टिंग के लिए भी एक यादगार उपलब्धि बन गई है।

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