विज्ञान

सूर्य इतना ज्यादा विस्फोटक क्यों है, 60 साल पुराने पहेली सुलझी

Tulsi Rao
30 April 2022 9:09 AM GMT
सूर्य इतना ज्यादा विस्फोटक क्यों है, 60 साल पुराने पहेली सुलझी
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जनता से रिश्ता वेबडेस्क। सूर्य (Sun) को हमारे जीवन ही नहीं पूरी पृथ्वी के जीवन के लिए भी ऊर्जा का स्रोत माना जाता है. वैज्ञानिकों का भी कहना है कि सूर्य पृथ्वी की समस्त प्रक्रियाओं के लिए अंतिम स्रोत होता है. इसी वजह से सूर्य वैज्ञानिकों के लिए गहन अध्ययन का विषय है. वे ना केवल सूर्य की नाभकीय प्रतिक्रियाओं (Nuclear Reactions) का अध्ययन कर रहे हैं, बल्कि उसकी सतह पर पैदा होने वाली सौर ज्वाला (Solar Flare) , और पवनों और अन्य विकिरणों का भी अध्ययन कर रहे हैं. नए अध्ययन में दावा किया गया है कि शोधकर्ताओं ने 60 साल पुरानी उस पहेली को सुलझा लिया गया है जो सूर्य को एक बहुत ज्यादा विस्फोटक बनाए रखती है.

एक अक्षय ऊर्जा स्रोत
पृथ्वी पर भी मानव विकास संबंधित क्रियाओं के लिए ऊर्जा के स्रोतों की तलाश में या तो सौर ऊर्जा का उपयोग करने का प्रयास किया जा रहा है या फिर परमाणु ऊर्जा के रूप में सूर्य जैसी ऊर्जा ही पैदा करने का प्रयास किया है. अभी तक सूर्य जैसे ऊर्जा स्रोत विकसित करने में सबसे बड़ी चुनौती नाभकीय संलयन को नियंत्रण करना है इसके लिए भी सूर्य जैसे पिंड का अध्ययन अहम है जो कुछ ही मिनट में इतनी ऊर्जा पैदा करता है जो दुनिया को 20 हजार साल तक दुनिया को ऊर्जा दे सकता है.
क्या है वह प्रक्रिया
पिछले छह दशक से वैज्ञानिक चुंबकीय पुनर्संयोजन (Magnetic Reconnection) मैग्नेटिक रीकनेक्शन नाम की विस्फोटक प्रक्रिया को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं. इसी की वजह से सूर्य की सतह पर सौर ज्वालाएं पैदा होती हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस ज्वलांत प्रक्रिया को बेहतर समझने से उसके नाभकीय संलयन प्रक्रिया को बेहतर समझने में मदद मिल सकती है. इससे वे पृथ्वी का चक्कर लगा रहे सैटेलाइटों की तकनीक को प्रभावित करने वाले कणों के तूफानों का सही पूर्वानुमान लगाने में भी सहायता मिल सकती है.
विस्फोटक चुंबकीय पुनर्संयोजन
वैज्ञानिक लंबे समयसे मैग्नोटोस्पियर मल्टीस्केल मिशन या MMS पर काम कर रहे हैं. उन्होंने यह मत बनाया है जो इस बात की व्याख्या करता है कि तीव्र पुनर्संयोजन कहलाने वाला सबसे विस्फोटक चुंबकीय पुनर्संयोजन कैसे काम करता है और इसकी गति इतनी नियमित और सतत क्यों है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अब उन्होंने यह जानने में सफलता हासिल कर ली है कि इस तरह का चुंबकीय पुनर्संयोजन इतना तेज क्यों होता है.
क्या होता है चुंबकीय पुनर्संयोजन
नासा के अनुसार चुंबकीय पुनर्संयोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जो प्लाज्मा में होती है जिसे पदार्थ की चौथी अवस्था कहा जाता है. प्लाज्मा का स्थिति तब बनती है जब गैस में इतनी ऊर्जा आ जाती है कि उसके परमाणु टूट कर अलग हो जाते हैं जिससे ऋणात्मक आवेश वाले इलेक्ट्रॉन और धनात्मक आवेश वाले आयन एक साथ अलग-बगल मौजूद रहने लगते हैं. यह ऊर्जावान, द्रव्य के जैसा पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र के लिए बहुत अधिक संवेदनशील हो जाता है.
टकरावहीन प्लाज्मा में होती है ये प्रक्रिया
डार्टमाउथ कॉलेज में भौतिकी की प्रोफ्से यी सिन लियु का कहना है कि अब इसकी व्याख्या करने वाला पूरा सिद्धांत मिल गया है. नेचर के कम्यूनिकेशन्स फिजिक्स जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में दर्शाया गया है कि कैसे तीव्र पुनर्संयोजन की प्रक्रिया विशेष तौर पर टकरावहीन प्लाज्मा में होती है. टकराव हीन प्लाज्मा वह प्लाज्मा होता है जिसके कण इस तरह से फैलते हैं कि वे आपस में टकराते नहीं हैं.
हॉल प्रभाव की भूमिका
नया सिद्धांत कहता है कि इस प्रक्रिया में तेजी लाने का काम हॉल प्रभाव करता है जो मैग्नेटिक फील्ड और विद्युत धाराओं की अंतरक्रिया होती है. तीव्र चुंबकीय पुनर्संयोजन के दौरान प्लाज्मा में आवेशित कण यानि आयन और इलेक्ट्रॉन एक समूह के तौर पर घूमना बंद कर देते हैं और अलग अलग घूमते हुए वे हॉल प्रभाव देते हैं, जिसमें एक अस्थिर ऊर्जा निर्वात बन जाता है जहां पुनर्संयोजन हो जा जाता है. ऊर्जा निर्वात के आसपास मैग्नेटिक फील्ड से दबाव के कारण निर्वात फूटता है और तेजी से बहुत सारी मात्रा में ऊर्जा निकलने लगती है जिसकी दर का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि चुंबकीय पुनर्संयोजन की क्रिया को समझने से हमें बेहतर तरीके से बता सकते हैं कि पृथ्वी पर भूचुंबकीय तूफान या फिर सौर ज्वाला जैसी घटनाएं कब असर डालेंगी. अगर हम समझ पाएं कि पुनर्संयोजन कैसे शुरू होता है, इससे हमें ऊर्जा संबंधी शोधों में सहायता मिलेगी जिससे हमें संयलयन उपकरण के चुंबकीय क्षेत्र को नियंत्रित कर सकेंगे. शोधकर्ता अब इसका अंतरिक्ष में प्रयोग करने की तैयारी में लगे हैं.


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