विज्ञान

स्टडी: रेडियो कॉलर से होगा भालू के व्यवहार में आए बदलाव का अध्ययन

Gulabi
28 April 2021 4:07 PM IST
स्टडी: रेडियो कॉलर से होगा भालू के व्यवहार में आए बदलाव का अध्ययन
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उत्तराखंड की वन्यजीव विविधता भले ही उसे विशिष्ट पहचान दिलाती है

उत्तराखंड की वन्यजीव विविधता भले ही उसे विशिष्ट पहचान दिलाती है, मगर यह भी सच है कि जंगली जानवरों के आतंक ने स्थानीय जनमानस की नींद उड़ाई हुई है। बाघ, गुलदार व हाथियों के बाद भालू के बढ़ते हमलों ने चिंता बढ़ा दी है। इसे देखते हुए वन्यजीव महकमे ने अब भालुओं के व्यवहार में आई तब्दीली का अध्ययन कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए तैयारियां अंतिम चरण में है। सबसे पहले चमोली जिले के जोशीमठ क्षेत्र में आबादी के करीब आ रहे भालुओं को पकड़कर उन पर रेडियो कालर लगाए जाएंगे। धीरे-धीरे अन्य क्षेत्रों में भी इसी प्रकार की पहल की जाएगी। राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जेएस सुहाग के अनुसार अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर भालू-मानव संघर्ष को थामने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार की जाएगी।


राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में पिछले कुछ समय से भालू के व्यवहार में आक्रामकता अधिक देखी जा रही है। और तो और सर्दियों में बर्फबारी होने से पहले गुफाओं में हाइबरनेशन (शीत निंद्रा) के लिए जाने वाले भालुओं की यह प्रक्रिया बाधित हुई है। यही कारण है कि ये अब सर्दियों में भी आबादी के नजदीक नजर आ रहे हैं। परिणामस्वरूप भालू और मनुष्य के बीच संघर्ष बढ़ा है। विभागीय आंकड़ों पर ही गौर करें तो राज्य में वर्ष 2000 से 2020 तक भालूओं के हमलों में 64 व्यक्तियों की जान गई, जबकि 1631 घायल हुए हैं।
बीते वर्ष भालुओं ने 58 व्यक्तियों को घायल किया, जबकि तीन की जान ली। यही नहीं, आबादी वाले इलाकों में इनकी सक्रियता लगातार बनी हुई है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए अब गुलदार और हाथियों की तरह भालुओं के व्यवहार में आए बदलाव के कारणों का पता लगाने को अध्ययन कराने की कवायद की जा रही है। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जेएस सुहाग ने बताया कि भालुओं को रेडियो कालर लगाने के मद्देनजर इन्हें पकड़ने को विशेष पिंजरा तैयार किया गया है। यह पिंजरा पानी के टैंकर की तरह लोहे से बना है। इसके साथ ही भालुओं पर लगाने के लिए विशेष प्रकार के रेडियो कालर भी इस सप्ताह विभाग को उपलब्ध हो जाएंगे।

उन्होंने बताया कि चमोली के जोशीमठ में पिंजरा लगाया गया है। वहां चार भालू आबादी के नजदीक देखे जा रहे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान की मदद से सबसे पहले इन्हें ही पकड़कर रेडियो कालर लगाए जाएंगे। रेडियो कालर से जहां इनके मूवमेंट पर निरंतर नजर रहेगी, वहीं यह भी देखा जाएगा कि ये कब और किस वक्त आबादी के करीब आते हैं। इसके साथ ही अन्य बिंदुओं पर भी अध्ययन कराया जाएगा।
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