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विज्ञान
स्पेस इकॉनमी 2033: 44 अरब डॉलर का आंकड़ा छूने को तैयार भारत
Tara Tandi
28 Oct 2026 2:04 PM IST

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नई दिल्ली: भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अपने वैज्ञानिक और रणनीतिक लक्ष्यों के साथ-साथ आर्थिक विकास, निजी निवेश और औद्योगिक क्षमता में भी लगातार योगदान दे रहा है। भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के 2033 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। बुधवार को जारी एक सरकारी फैक्टशीट के अनुसार, रियूजेबल लॉन्च व्हीकल (पुन: उपयोग में आने वाले लॉन्च वाहन), एयर-ब्रीदिंग प्रोपल्शन, इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन और इन-स्पेस डॉकिंग जैसी उभरती तकनीकें इस विकास में मदद कर रही हैं।
यह तकनीकी गति पहले से ही आर्थिक अवसर पैदा कर रही है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) ने ISRO द्वारा विकसित 83 तकनीकों को भारतीय उद्योगों तक पहुंचाने के लिए 118 टेक्नोलॉजी ट्रांसफर समझौते किए हैं। इसके परिणामस्वरूप, निवेशकों का भरोसा भी बढ़ रहा है। फैक्टशीट के अनुसार, 31 मार्च 2026 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स में कुल निवेश लगभग 618.5 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। इसमें फंडिंग अब शुरुआती चरण (सीड सपोर्ट) से आगे बढ़कर बड़े, ग्रोथ-स्टेज राउंड की ओर बढ़ रही है।
ये सभी घटनाक्रम दर्शाते हैं कि भारत की उभरती अंतरिक्ष तकनीकें न केवल राष्ट्रीय क्षमता को आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए एक मजबूत, उद्यम-आधारित अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का निर्माण भी कर रही हैं।
भारत की अंतरिक्ष यात्रा अब 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' की ओर देख रही है। SpaDeX के माध्यम से, भारत कक्षा में दो अंतरिक्ष यानों की ऑटोनॉमस (स्वचालित) डॉकिंग हासिल करने वाला चौथा देश बन गया है। वहीं, 'गगनयान' मिशन भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान के लक्ष्यों को आगे बढ़ा रहा है।
सितंबर 2024 में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल' (NGLV) के विकास को मंजूरी दी। इसके लिए 8,240 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई है, जिसमें विकास लागत, तीन विकासात्मक उड़ानें, आवश्यक सुविधाएं, कार्यक्रम प्रबंधन और लॉन्च अभियान शामिल हैं।
लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 30 टन तक की क्षमता के लिए डिज़ाइन किया गया NGLV, भारत की मौजूदा लॉन्च पेलोड क्षमता को तीन गुना कर देता है (LVM3 की 10 टन LEO क्षमता की तुलना में)। इसके अलावा, अंतरिक्ष तक पहुंच को सस्ता बनाने के लिए 14 टन LEO पेलोड क्षमता वाला एक आंशिक रूप से रियूजेबल (पुन: उपयोग योग्य) NGLV संस्करण भी विकसित किया जा रहा है। इसकी रियूजेबिलिटी (पुन: उपयोग की क्षमता) अंतरिक्ष तक पहुंचने की लागत को कम कर देगी।
NGLV राष्ट्रीय और व्यावसायिक, दोनों तरह के मिशनों को संभव बनाएगा। इनमें 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' के लिए मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन, साथ ही चंद्रमा और अन्य ग्रहों की खोज से जुड़े मिशन शामिल हैं। इसके अलावा, 'लो अर्थ ऑर्बिट' (पृथ्वी की निचली कक्षा) में संचार और पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों के समूह (constellations) भी भेजे जाएंगे। ये मिशन पूरे अंतरिक्ष इकोसिस्टम को लाभ पहुंचाएंगे और देश की क्षमता व सामर्थ्य को बढ़ाएंगे।
भारत के अंतरिक्ष मिशन का उद्देश्य आम नागरिकों की सेवा करना है। यही विज़न आज पूरे देश में लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है। संचार उपग्रह दूर-दराज और कम सुविधा वाले इलाकों तक कनेक्टिविटी पहुंचाते हैं। पृथ्वी अवलोकन से प्राप्त डेटा कृषि, आपदा आकलन, योजना बनाने, पर्यावरण की निगरानी और अन्य राष्ट्रीय आवश्यकताओं में मदद करता है।
मौसम उपग्रह चक्रवातों और मानसून पर नज़र रखते हैं, जिससे समय रहते चेतावनी मिल जाती है और लोगों की जान बचती है। मछुआरे, किसान और तटीय समुदायों के लोग अपनी आजीविका की सुरक्षा के लिए इन चेतावनियों पर निर्भर रहते हैं। ये प्रणालियां नागरिकों को जोड़ती हैं, समुदायों की रक्षा करती हैं, शासन व्यवस्था को मजबूत बनाती हैं और समावेशी व टिकाऊ विकास को बढ़ावा देती हैं। इन सेवाओं के अलावा, अंतरिक्ष भारत की सीमाओं की रक्षा भी करता है और इसके भविष्य को आकार देता है। फैक्टशीट में यह भी बताया गया है कि अंतरिक्ष-आधारित संचार प्रणालियां राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करती हैं।
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