विज्ञान

वैज्ञानिकों ने विकसित की खास तरह की कंप्यूटर, जाने इसके बारे में

Gulabi
14 Oct 2021 3:45 PM GMT
वैज्ञानिकों ने विकसित की खास तरह की कंप्यूटर, जाने इसके बारे में
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वैज्ञानिकों ने विकसित की

पिछले कुछ सालों में ब्रेन-कंप्यूटर इंटफेस को आधुनिक बनाने में इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को काफी ज्यादा मदद मिली है. ऐसे यंत्र बनाए गए हैं जो लकवाग्रस्त लोगों को चला सकते हैं. अब नीदरलैंड्स और जर्मनी के वैज्ञानिकों ने मिलकर ऐसा कंप्यूटर बनाया है जो विचारों को बातों में बदल सकता है. यह तकनीक भविष्य में उन लोगों की मदद कर सकती है, जिन्हें किसी भी तरह के बोलने संबंधी दिव्यांगता है.

डच और जर्मन वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग की तकनीक को और ज्यादा बेहतर और आधुनिक बना दिया है. वैज्ञानिकों ने मिर्गी (Epilepsy) से पीड़ित एक महिला के दिमाग में इलेक्ट्रोड लगा दिए. जिसकी वजह से वह जो भी सोचती थी, वह शब्द वह बोलने लगती थी. इस स्टडी की रिपोर्ट हाल ही में साइंटिफिक जर्नल कम्यूनिकेशन बायोलॉजी में प्रकाशित हुई है.

नीदरलैंड्स के मैस्ट्रिच यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के डॉ. पीटर कुबेन ने कहा कि हमने मिर्गी पीड़ित मरीजों पर कई तरह के जांच किए. ये जांच केंपेनहेघे एक्सपर्टीज सेंटर में किए गए. इन मरीजों के दिमाग में इलेक्ट्रोड्स डाले गए थे. इनसे स्टडी में शामिल होने के लिए पूछा गया था. जब इन्होंने अनुमति दी तब इन्हें इस रिसर्च में शामिल किया गया.
डॉ. पीटर कुबेन ने बताया कि एक जांच सिर्फ बोलने पर आधारित थी. पहला काम ये किया गया कि मरीज को कुछ पढ़ने को दिया गया. इसके बाद कंप्यूटर ने पढ़ते समय बोले गए शब्दों और उस समय हो रही दिमागी गतिविधि के संबंध को समझा. इसके लिए कंप्यूटर ने मशीन लर्निंग प्रोग्राम को एक्टिवेट किया था.
मशीन लर्निंग प्रोग्राम को एक्टिवेट करने के बाद कंप्यूटर ने सीधे एक ऑडियो जेनरेट किया, जिसमें उन शब्दों को कंप्यूटर ने जोर से बोला, जिसे मिर्गी के मरीज ने पढ़ते समय या तो बेहद धीमे बोला था या सिर्फ मन में सोचा था. इस स्टडी के प्रमुख शोधकर्ता क्रिश्चियन हर्फ ने कहा कि सामान्य तरीके से बोलने पर भी जो डेटा मॉडल्स जुटाए गए थे, उनसे भी कंप्यूटर स्पीच को इमैजिन कर सकता है.
क्रिश्चियन हर्फ ने कहा कि इस प्रयोग में सबसे बड़ी सफलता जो मिली है उसे स्पीच न्यूरोप्रोस्थेसिस (Speech Neuroprosthesis) कहते हैं. जिन लोगों को बोलने में गंभीर दिक्कतें होती हैं, या फिर वो किसी दिमागी चोट या बीमारी की वजह से बोल नहीं पाते हैं, उनके लिए यह थैरेपी काम आएगी.
क्रिश्चियन हर्फ ने बताया कि फिलहाल ये स्टडी और इसके परिणाम 100 शब्दों पर आधारित हैं. धीरे-धीरे हम अधिक शब्दों को इस थैरेपी में शामिल करेंगे ताकि ज्यादा बेहतर रिजल्ट आ सकें. कुछ दिनों के बाद मरीज पूरे वाक्य को कंप्यूटर के जरिए प्रोसेस कराकर बोल सकेंगे.
यानी अभी न बोल पाने वाले मरीजों के लिए कुछ शब्दों की सीमा है. लेकिन भविष्य में वो इस थैरेपी के जरिए मन में जो भी शब्द या वाक्य सोचेंगे उन्हें कंप्यूटर तत्काल प्रोसेस करके एक ऑडियो जेनरेट कर देगा. या फिर स्क्रीन पर दिखा देगा. यह भविष्य की नई तकनीक है.
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