विज्ञान

पृथ्वी पर कैसे आई ऑक्सीजन...शोध में स्पष्ट किया ये रहस्य

Tara Tandi
29 Oct 2020 3:06 PM GMT
पृथ्वी पर कैसे आई ऑक्सीजन...शोध में स्पष्ट किया ये रहस्य
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जीवन के लिए ऑक्सीजन (Oxygen) की मौजूदगी एक अहम कारक है. पृथ्वी (Earth) पर ज्यादातर जीवन ऑक्सीजन पर ही निर्भर है. पृथ्वी के बाहर जब वैज्ञानिक जीवन के संकेतों (Bio signatures) की तलाश करते हैं

जनता से रिश्ता वेबडेस्क| जीवन के लिए ऑक्सीजन (Oxygen) की मौजूदगी एक अहम कारक है. पृथ्वी (Earth) पर ज्यादातर जीवन ऑक्सीजन पर ही निर्भर है. पृथ्वी के बाहर जब वैज्ञानिक जीवन के संकेतों (Bio signatures) की तलाश करते हैं तो वे ऑक्सीजन के संकेत भी ढूंढते हैं, लेकिन आज से साढ़े चार अरब साल पहले पृथ्वी पर ऑक्सीजन थी ही नहीं. पृथ्वी पर ऑक्सीजन कैसे आई यह रहस्य आज भी शोध का विषय है. ताजा शोध ने इस पर रोशनी डालने की कोशिश की है.

कई दशकों से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि पृथ्वी (Earth) पर ऑक्सीजन (oxygen) पहली बार कैसे और क्यों हवा (Air) में आई थी. वे लंबे समय से यह मान रहेथे कि जीवन से ही पैदा होने वाली ऑक्सीजन ही धीरे धीरे वायुमंडल में जमा होती गई. शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर निकोलस डौफाज ने कहा, "हम अब भी निश्चित नहीं हैं कि यह कैसे हुआ लेकिन इस दिशा में थोड़ी सी भी जानकारी बहुत अहम होगी." कई दशकों से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि पृथ्वी (Earth) पर ऑक्सीजन (oxygen) पहली बार कैसे और क्यों हवा (Air) में आई थी. वे लंबे समय से यह मान रहेथे कि जीवन से ही पैदा होने वाली ऑक्सीजन ही धीरे धीरे वायुमंडल में जमा होती गई. शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर निकोलस डौफाज ने कहा, "हम अब भी निश्चित नहीं हैं कि यह कैसे हुआ लेकिन इस दिशा में थोड़ी सी भी जानकारी बहुत अहम होगी."

कई दशकों से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि पृथ्वी (Earth) पर ऑक्सीजन (oxygen) पहली बार कैसे और क्यों हवा (Air) में आई थी. वे लंबे समय से यह मान रहेथे कि जीवन से ही पैदा होने वाली ऑक्सीजन ही धीरे धीरे वायुमंडल में जमा होती गई. शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर निकोलस डौफाज ने कहा, "हम अब भी निश्चित नहीं हैं कि यह कैसे हुआ लेकिन इस दिशा में थोड़ी सी भी जानकारी बहुत अहम होगी."



शिकागो यूनिवर्सिटी के स्नातक छात्र एंडी हर्ड, डोफाज और उनके साथियों ने पृथ्वी (Earth) के वायुमंडल (Atmosphere) में महासागरों (Oceans) के लोहे (Iron) की भूमिका की नई जानकारी की खुलासा किया. इस शोध ने पृथ्वी के इतिहास के बारे में और ज्यादा जानकारी दी है. इस अध्ययन से दूसरे तारों के सिस्टम के जीवन के अनुकूल संभावित ग्रहों की खोज में मददगार हो सकता है.

वैज्ञानिकों ने सावधानी से पुरातन पृथ्वी (Earth) की टाइमलाइन (Timeline) बनाई है. इसके लिए उन्होंने पुरानी चट्टानों (Rocks) , उनके रासायनिक संरचना और उनमें हुए बदलावों का अध्ययन किया. हर्ड ने बताया कि 2.4 अरब साल पहले पृथ्वी पर बड़े पैमाने पर ऑक्सजीन (oxygen) हमेशा के लिए आने से पहले भी आक्सीजन के संकेत मिलते हैं. अभी तक उपयोग में लाई गई पद्धतियों से इसके बारे में सटीक जानकारी नहीं मिल सकी थी.



लोहे (Iron) की चीजों पर लगी जंग (Rust) से यह पता लगाया जाता है की आसपास पानी (Water) और ऑक्सीजन (Oxygen) थी कि नहीं. पुराने समय में महासागरों (Oceans) में लोहे की भरपूर मात्रा थी जो आसापास के ऑक्सीजन को पकड़ लिया करते थे. जंग बनने का मतलब होता है कि उसने आसपास की ऑक्सीजन का उपयोग कर लिया है.

वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि इस समस्या के बाद भी ऑक्सीजन (Oxygen)हवा में कैसे बनी रह गई. वे जानते थे कि कुछ लोहा (Iron) महासागरों (Ocean) से सल्फर के साथ मिलकर ज्वालामुखियों (volcano) के जरिए पाइराइट के तौर पर बाहर आ रहा था. डोफॉज की लैब में वैज्ञानिकों ने छोटे लोहे के आसोटोप्स के वेरिएशन मापने का काम किया जिससे पता चल सके कि लोहा किस तरह से कहां पहुंचा. इस तरह उन्होंने लोहे का पाइराइट तक का रास्ता पता कर लिया.



हर्ड ने बताया कि शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका की 2.6 से 2.3 साल पुरानी चट्टानों का विश्लेषण किया और पाया की महासागरों (Oceans) ने भी लोहों (Iron) की जंग (Rust) के के लिए काफी ऑक्सीजन (Oxygen) खींची होगी. डोफॉज ने कहा कि यह काफी जटिल था लेकिन उनकी टीम ने इस समस्या के एक हिस्से को सुलझा लिया.



शोधकर्ताओं का कहना है की इस दिशा में हुए प्रगति बहुत ही अहम है, खासतौर पर जब हम बाह्यग्रहों (Exoplanets) में जीवन (Life) तलाश कर रहे हैं. हमें पूरे विस्तार से समझना होगा कि पृथ्वी जीवन पनपाने लायक कैसे बनी. पृथ्वी जीवन के अनुकूल कैसे बनी, यह जानकर वे इस तरह के प्रमाण दूसरे ग्रहों में भी देख सकते हैं. शोधकर्तओं को लगता है कि ऑक्सीजन के आने के पहले की पृथ्वी बाह्यग्रहों को समझने के लिए बहुत ही अच्छी प्रयोगशाला हो सकती है. .

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