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विज्ञान
स्पेस में आईवॉश भी चुनौती, जानें क्या है 'सील आई इरिगेशन गॉगल्स', कैसे करता है काम?
jantaserishta.com
24 May 2026 6:03 PM IST

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नई दिल्ली: स्पेस की दुनिया रहस्यों के साथ ही रोमांच से भी भरी पड़ी है। पृथ्वी पर की गई छोटी सी एक्टिविटी भी स्पेस बड़ी बात या एक चुनौती हो सकती है। ऐसी ही एक समस्या है स्पेस में आईवॉश या आंखों को धुलना, पृथ्वी पर यह जितना आसान है, स्पेस में उतना ही मुश्किल। हालांकि, एस्ट्रोनॉट्स इस समस्या से राहत पाने के लिए 'सील आई इरिगेशन गॉगल्स' का इस्तेमाल करते हैं।
भारतीय वायुसेना के पायलट और भारत के चुनिंदा अंतरिक्ष यात्री रहे ग्रुप कैप्टन शुभांशु शक्ला का एक पुराना वीडियो सामने आया, जिसमें वह अंतरिक्ष में चिकित्सा संबंधी छोटी-मोटी समस्याओं को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते नजर आए। शुभांशु शक्ला भारत के गगनयान मिशन से जुड़े रहे हैं।
वीडियो में वह बताते नजर आए, अंतरिक्ष में कोई भी छोटी समस्या बहुत जल्दी गंभीर रूप ले सकती है क्योंकि सबसे नजदीकी अस्पताल धरती पर 400 किलोमीटर नीचे होता है। ऐसे में अंतरिक्ष यात्री उड़ान से पहले बुनियादी मेडिकल ट्रेनिंग लेते हैं। शुभांशु ने बताया कि अंतरिक्ष की माइक्रोग्रैविटी (शून्य गुरुत्वाकर्षण) सबसे आसान काम को भी बेहद मुश्किल बना देती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आंख धोना है।
धरती पर अगर आंख में कुछ चला जाए तो हम आसानी से पानी से धो लेते हैं। लेकिन अंतरिक्ष में पानी न तो बहता है और न ही एक जगह रुकता है। वह छोटे-छोटे गोलाकार बूंदों में तैरने लगता है और पूरे स्पेसक्राफ्ट में इधर-उधर घूमने लगता है। अगर किसी एस्ट्रोनॉट की आंख में चोट लग जाए या धूल चली जाए तो सामान्य तरीके से आंख धोना असंभव हो जाता है। इसी समस्या का समाधान निकालने के लिए वैज्ञानिक 'सील आई इरिगेशन गॉगल्स' का इस्तेमाल करते हैं।
यह सीलबंद विशेष प्रकार के गॉगल्स हैं, जो देखने में साइंस फिक्शन फिल्मों जैसे लगते हैं। गॉगल्स की खासियत है कि ये गॉगल्स आंखों पर पूरी तरह फिट बैठते हैं और इनमें दो ट्यूब लगी होती हैं। एक ट्यूब स्टराइल सलाइन (शुद्ध पानी) को अंदर ले जाती है और आंख को धोती है। वहीं, दूसरी ट्यूब सक्शन (खिंचाव) की मदद से गंदे पानी को तुरंत बाहर निकाल लेती है। यह पूरी तरह ‘क्लोज्ड सिस्टम’ है, जिससे पानी कहीं भी नहीं फैलता और केबिन साफ रहता है। यह सिस्टम स्विमिंग गॉगल्स की तरह डिजाइन किया गया है।
शुभांशु शक्ला ने बताया, “खुशकिस्मती से मेरे मिशन के दौरान इसका इस्तेमाल नहीं करना पड़ा लेकिन अंतरिक्ष यात्रियों को यही उम्मीद रहती है कि उन्हें इन उपकरणों की जरूरत ही न पड़े। अंतरिक्ष में चांद की धूल या अन्य कणों से आंखों को खतरा रहता है, इसलिए यह उपकरण बेहद उपयोगी साबित होता है।
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