विज्ञान

डरावनी भी खूबसूरत भी! समुद्र की गहराई में दिखी अनोखी बैरलआई मछली

nidhi
30 Oct 2026 10:23 AM IST
डरावनी भी खूबसूरत भी! समुद्र की गहराई में दिखी अनोखी बैरलआई मछली
x
बैरलआई मछली की नई फुटेज ने चौंकाया
कैलिफोर्निया: समुद्र की गहराइयों में रहने वाली बैरलआई मछली अपनी अनोखी बनावट के कारण एक बार फिर चर्चा में है। इसका सिर पारदर्शी गुंबद जैसा दिखाई देता है, जिसके भीतर हरे रंग के लेंस वाली आंखें नजर आती हैं। मॉन्टरे बे एक्वेरियम रिसर्च इंस्टीट्यूट, यानी एमबीएआरआई के वैज्ञानिकों ने हालिया अभियान में इस मछली की बेहद स्पष्ट 4K फुटेज रिकॉर्ड की है। यह मछली पहली बार कैमरे में कैद नहीं हुई है; संस्थान के अनुसार, उसके शोध अभियानों में यह बैरलआई की पहली 4K रिकॉर्डिंग है।
वैज्ञानिकों को यह मछली कैलिफोर्निया के तट से लगभग 90 किलोमीटर दूर, समुद्र में करीब 600 मीटर की गहराई पर दिखाई दी। शोध पोत ‘डेविड पैकार्ड’ से संचालित अभियान में दूर से नियंत्रित होने वाले अंडरवाटर रोबोट ‘डॉक रिकेट्स’ का इस्तेमाल किया जा रहा था। टीम ने करीब 20 मिनट तक मछली का अवलोकन किया। अलग-अलग रोशनी में रिकॉर्डिंग के साथ उसके त्रिआयामी दृश्य भी लिए गए।
बैरलआई का वैज्ञानिक नाम Macropinna microstoma है। इसके सिर के ऊपरी हिस्से पर तरल से भरा पारदर्शी आवरण होता है। इसी के भीतर उसकी नली जैसी आंखें घूम सकती हैं। सामान्य मछलियों से अलग यह संरचना उसे ऊपर की ओर भोजन तलाशने और फिर सामने मौजूद शिकार पर नजर रखने में मदद करती है। इसका पारदर्शी सिर केवल देखने में विचित्र नहीं है, बल्कि गहरे समुद्र में जीवन के अनुकूल विकसित हुई विशेषता है।
इसके चेहरे को देखकर आंखों की पहचान में भ्रम हो सकता है। मुंह के ऊपर सामने की ओर दिखाई देने वाले दो गहरे निशान इसकी आंखें नहीं हैं। वे गंध पहचानने वाले अंग हैं, जिन्हें ‘नेयर्स’ कहा जाता है। उनकी भूमिका मनुष्यों की नासिकाओं से मिलती-जुलती है। वास्तविक आंखें सिर के पारदर्शी हिस्से के भीतर ऊपर की ओर स्थित होती हैं। तस्वीरों में दिखने वाले हरे गोल हिस्से इन्हीं आंखों के लेंस हैं।
बैरलआई समुद्र के ‘ट्वाइलाइट जोन’ में रहती है, जहां सतह से आने वाला सूर्य का प्रकाश बहुत कमजोर पड़ जाता है। एमबीएआरआई के अनुसार, यह लगभग 460 से 800 मीटर की गहराई पर पाई जाती है और इसकी लंबाई करीब 15 सेंटीमीटर तक हो सकती है। इसका क्षेत्र उत्तरी प्रशांत महासागर में बेरिंग सागर से जापान और बाजा कैलिफोर्निया तक फैला है।
शिकार खोजते समय यह अक्सर पानी में लगभग स्थिर रहती है और आंखें ऊपर की ओर रखती है। बड़े तथा चपटे पंख शरीर को संतुलित रखने में मदद करते हैं। नली जैसी आंखें कम रोशनी को केंद्रित कर ऊपर तैरते जीवों की परछाईं पहचानने में सहायक होती हैं। भोजन मिलने पर आंखें आगे की ओर घूम जाती हैं, जिससे मछली शिकार को नजरों से ओझल किए बिना पकड़ सकती है।
इस मछली की आंखों को लेकर लंबे समय तक वैज्ञानिकों के सामने सवाल था। वर्ष 1939 में इसके वैज्ञानिक वर्णन के बाद माना जाता रहा कि आंखें अपने स्थान पर स्थिर हैं। तब यह समझना कठिन था कि ऊपर देखने वाली आंखों और सामने की ओर मुंह वाली मछली भोजन कैसे पकड़ती है। बाद में प्राकृतिक वातावरण की वीडियो रिकॉर्डिंग और जहाज पर किए गए अवलोकन से आंखों के घूमने की क्षमता स्पष्ट हुई।
वैज्ञानिकों ने यह संभावना भी जताई है कि सिर का पारदर्शी आवरण भोजन जुटाते समय आंखों की रक्षा करता है। बैरलआई उन छोटे जीवों को खा सकती है, जो साइफोनोफोर नामक जेली जैसे समुद्री जीवों के डंकदार तंतुओं में फंसे होते हैं। इन तंतुओं के बीच भोजन तलाशने के दौरान आवरण सुरक्षा दे सकता है। इस भूमिका को वैज्ञानिक परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
नई रिकॉर्डिंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस प्रजाति से वैज्ञानिकों का सामना बहुत कम होता है। एमबीएआरआई ने लगभग 40 वर्षों में करीब सात हजार रोबोटिक गोते लगाए और 41 हजार घंटे से अधिक वीडियो रिकॉर्ड किया, लेकिन इस प्रजाति को केवल 11 बार देखा। पिछली बार संस्थान ने इसे 2021 में देखा था। हालिया अभियान में मछली को पकड़ा नहीं गया; वैज्ञानिकों ने उसके प्राकृतिक वातावरण में ही फुटेज ली। यह रिकॉर्डिंग गहरे समुद्र में उसकी दृष्टि और व्यवहार को समझने में मदद करेगी।
Next Story