धर्म-अध्यात्म

गीता का ज्ञान: रिश्तों में छिपा प्रेम और मोह का असली अंतर

Tara Tandi
13 Aug 2026 4:57 PM IST
गीता का ज्ञान: रिश्तों में छिपा प्रेम और मोह का असली अंतर
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True Love vs Attachment नई दिल्ली : किसी के साथ रहना अच्छा लगना प्रेम हो सकता है, लेकिन उसके बिना बेचैन हो जाना हमेशा प्रेम नहीं होता। कई बार रिश्तों में अपनापन और अधिकार की भावना इतनी घुल जाती है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम प्यार कर रहे हैं या सामने वाले से मोह करने लगे हैं। प्रेम में मन को विस्तार मिलता है, जबकि मोह धीरे-धीरे मन को बांधने लगता है। श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाओं में भी आसक्ति (अटैचमेंट), अपेक्षा और मन की स्थिरता को लेकर गहरी बातें कही गई हैं।
प्रेम में आजादी, मोह में अधिकार की भावना
सच्चा प्रेम किसी व्यक्ति को अपनी इच्छाओं के अनुसार बदलने की कोशिश नहीं करता। इसमें सामने वाले की पसंद, भावनाओं और स्वतंत्रता का सम्मान होता है। इसके विपरीत मोह में यह भावना मजबूत होने लगती है कि दूसरा व्यक्ति हमेशा हमारे मुताबिक व्यवहार करे।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 47वां श्लोक)
अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म करने पर है, उसके परिणाम पर नहीं। रिश्तों में भी इस सीख को समझा जा सकता है। प्रेम करें, अपना व्यवहार सच्चा रखें, लेकिन सामने वाला उसी तरह प्रतिक्रिया दे, इसकी जिद न करें।
जहां भरोसा है, वहां हर पल डर नहीं
अगर किसी रिश्ते में सच्चा प्रेम है तो दूरी या व्यस्तता के बावजूद विश्वास बना रहता है। लेकिन मोह बढ़ने पर व्यक्ति बार-बार यह सोच सकता है कि कहीं दूसरा उसे छोड़ न दे। फोन का जवाब देर से मिलना, कम बातचीत होना या अकेले समय बिताना भी बेचैनी पैदा करने लगता है। गीता मन को स्थिर रखने की सीख देती है।
भगवान कृष्ण कहते हैं-
“योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 का श्लोक 48)
यानी आसक्ति छोड़कर संतुलित मन से अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। रिश्तों में भी संतुलन जरूरी है। प्रेम हो, लेकिन इतना नहीं कि मन की शांति दूसरे व्यक्ति के हर व्यवहार पर निर्भर हो जाए।
प्रेम में अपनापन, मोह में खोने का भय
किसी को अपना मानना स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है जब वही अपनापन डर में बदल जाता है। जब हमें लगने लगे कि उस व्यक्ति के बिना हमारा जीवन अधूरा है, हमारी खुशी खत्म हो जाएगी या हम खुद को संभाल नहीं पाएंगे, तो यह भाव प्रेम से आगे बढ़कर अटैचमेंट का रूप ले सकता है।
गीता में कहा गया है-
“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 62वां श्लोक)
अर्थात किसी विषय के बारे में लगातार चिंतन करने से उसमें मोह पैदा होता है। यह बात रिश्तों पर भी लागू की जा सकती है। जब हमारा मन लगातार किसी एक व्यक्ति, उसके व्यवहार और उसकी प्रतिक्रिया में उलझा रहता है, तो भावनात्मक निर्भरता बढ़ सकती है।
उम्मीदों का बोझ रिश्ते को कर सकता है कमजोर
“उसने मुझे मैसेज क्यों नहीं किया?”, “उसने मेरी बात नहीं मानी”, “वह मेरे लिए इतना नहीं करता जितना मैं उसके लिए करती हूं” ऐसी अपेक्षाएं धीरे-धीरे रिश्ते में तनाव बढ़ा सकती हैं।
प्रेम का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला हमारी हर इच्छा पूरी करे। स्वस्थ रिश्ते में बातचीत, समझ और सम्मान होता है। अपनी भावनाएं व्यक्त करना जरूरी है, लेकिन हर भावना के बदले मनचाहा व्यवहार मिलने की उम्मीद रखना जरूरी नहीं।
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं-
“समत्वं योग उच्यते।”
(श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 48वां श्लोक)
अर्थात मन की समता ही योग है। रिश्तों में भी यही संतुलन हमें सिखाता है कि खुशी और दुख दोनों परिस्थितियों में खुद को संभालना सीखें।
प्रेम के लिए अपनी पहचान न खोएं
किसी रिश्ते को बचाने के लिए अपनी पसंद, आत्मसम्मान और व्यक्तित्व को पूरी तरह खत्म कर देना प्रेम नहीं है। अगर आपकी पूरी खुशी केवल एक व्यक्ति के व्यवहार पर निर्भर हो जाए, तो आपको अपने भीतर भी झांकने की जरूरत है। सच्चा प्रेम दो लोगों को जोड़ता है, लेकिन उनकी अलग पहचान भी बनाए रखता है। दोनों एक-दूसरे का सहारा बन सकते हैं, फिर भी अपनी जिंदगी, लक्ष्य और आत्मसम्मान के लिए खुद जिम्मेदार रह सकते हैं।
प्रेम कहता है “तुम खुश रहो”, मोह कहता है “तुम मेरे साथ रहो” प्रेम में परवाह होती है, लेकिन कब्जा नहीं। प्रेम सामने वाले की खुशी चाहता है, जबकि मोह कई बार उसकी आजादी को भी अपनी भावनाओं के लिए खतरा समझने लगता है।
इसलिए खुद से एक सवाल पूछिए, क्या इस रिश्ते में मुझे शांति मिलती है या हर समय खोने का डर बना रहता है? अगर प्रेम आपको बेहतर इंसान बना रहा है, भरोसा सिखा रहा है और भीतर से मजबूत कर रहा है, तो यह स्वस्थ प्रेम की निशानी हो सकती है। लेकिन अगर वही रिश्ता आपको लगातार भय, असुरक्षा और बेचैनी में रखता है, तो उसमें मोह का हिस्सा बढ़ रहा हो सकता है।
गीता की सीख का सार यही है कि रिश्तों से जुड़िए, उन्हें पूरी ईमानदारी से निभाइए, लेकिन अपनी मानसिक शांति को किसी व्यक्ति के हाथों में पूरी तरह मत सौंपिए। जहां अधिकार की जगह सम्मान, डर की जगह भरोसा और अपेक्षा की जगह समझ होती है, वहीं प्रेम अधिक सहज और सुंदर बनता है।
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