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धर्म-अध्यात्म

श्रावण में आखिर क्यों अलग-अलग रूप में पूजे जाते हैं शिव, जानें महादेव के हर स्वरूप का महत्व

Rani Sahu
22 July 2021 9:21 AM GMT
श्रावण में आखिर क्यों अलग-अलग रूप में पूजे जाते हैं शिव, जानें महादेव के हर स्वरूप का महत्व
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श्रावण में शिव की साधना काफी पुण्यदायी और कल्याणकारी मानी गई हैं

श्रावण में शिव की साधना काफी पुण्यदायी और कल्याणकारी मानी गई हैं. इसी कामना को लिए शिव भक्त लंबी दूरी तय करे पावन शिवधाम पहुंचते हैं और उनका विभिन्न चीजें से अभिषेक करते हैं. शिव की लीलाओं की तरह उनकी महिमा भी अपरंपार है. शिवलिंग की तरह भगवान शिव की साधना के लिए उनके कई रूप जाते हैं, जिनकी पूजा करने पर अलग–अलग फल की प्राप्ति होती है.

पशुपति
सनातन परंपरा के ज्ञान शून्य अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को पशु के समान माना गया है और भगवान शिव हमें ज्ञान देने वाले और अज्ञान से बचाने वाले देवता हैं. यही कारण है कि उन्हें पशुपति नाथ कहा जाता है.
मृत्युंजय
कहते हैं कि मृत्यु पर कोई विजय नहीं पा सकता है लेकिन भगवान शिव ने समुद्र मंथन के दौरान विष पीकर मृत्यु पर विजय पाई थी, इसीलिए वे मृत्युंजय कहलाए. आज भी जब कभी भी लोगों पर मृत्यु तुल्य संकट आता है तो लोग विशेष रूप से महामृत्युंजय का पाठ करवाते हैं.
त्रिनेत्र
मान्यता है कि एक बार माता पार्वती ने विनोदवश भगवान शिव की दोनों आंखें हाथों से बंद कर ली. ऐसा करते ही पूरे विश्व जगत में अंधकार छा गया. सारा संसार अकुलाने लगा. तब भगवान शिव का माथे से तीसरा नेत्र प्रकट हुआ और चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश छा गया. तीसरे नेत्र से निकले तेज प्रकाश से हिमालय जैसा पर्वत भी जलने लगा. तब माता पार्वती ने घबरा कर उन्हें अपने इस नेत्र का बंद करने के लिए उनकी स्तुति करने लगीं. तभी से भगवान शिव त्रिनेत्र कहलाए.
रुद्र
दु:ख और उसके सभी कारणों को नाश करने तथा दुष्टों का संहार आदि में क्रूर रुप धारण करने के कारण भगवान शिव रुद्र कहलाए. मान्यता है कि उनके रुद्र रूप से निकले आंसू ही रुद्राक्ष का बीज हैं.
नीलकंठ
भगवान शिव ने जब समुद्र मंथन से निकले विष को पी लिया तो उनका कंठ नीला पड़ गया था. तभी से वे नीलकंठ कहलाए. भगवान इस स्वरूप में चंद्रमा के समान उज्जवल वर्ण लिये हुए हैं. विष के प्रभाव से उनकी ग्रीवा नीली पड़ गई है. शिव के इस स्वरूप की पूजा करने से मनुष्य स्वस्थ एवं सुखी रहता है.
गंगाधर
स्वर्ग से जब गंगा पृथ्वी पर चलने को तैयार हुईं तो उनके वेग को कम करने के लिए शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में लपेट लिया था. तभी से वे गंगाधर कहलाए. भगवान शिव के इस स्वरूप की पूजा करने से मनुष्य की कई पीढ़िया तर जाती हैं.


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