धर्म-अध्यात्म

Narak Chaturdashi पर क्यों होती है यमराज की पूजा? जानें इसका धार्मिक महत्व और परंपरा से जुड़ी कथा

Harrison
10 Oct 2025 9:11 PM IST
Narak Chaturdashi पर क्यों होती है यमराज की पूजा? जानें इसका धार्मिक महत्व और परंपरा से जुड़ी कथा
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Religion Spirituality,धर्म अध्यात्म: हर साल दीपावली से एक दिन पहले आने वाली नरक चतुर्दशी (जिसे छोटी दीवाली भी कहा जाता है) का हिंदू धर्म में विशेष महत्व होता है। इस दिन लोग अभ्यंग स्नान (तेल मालिश के साथ स्नान), दीपदान और यमराज की पूजा करते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि इस शुभ पर्व पर मृत्यु के देवता यमराज की पूजा क्यों की जाती है? मृत्यु का नाम सुनते ही आमतौर पर भय का भाव आता है, लेकिन नरक चतुर्दशी पर यमराज की आराधना जीवन की रक्षा और पापों से मुक्ति के लिए की जाती है।
इस रिपोर्ट में जानिए नरक चतुर्दशी का धार्मिक महत्व, पौराणिक कथा, और यमराज की पूजा से जुड़ी मान्यताएं।
नरक चतुर्दशी: नाम में ही छिपा है रहस्य
'नरक चतुर्दशी' शब्द का अर्थ है – "नरक से मुक्ति दिलाने वाली चतुर्दशी"। इसे रूप चौदस, काली चौदस, या यम चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है।
इस दिन प्रात:काल सूर्योदय से पहले स्नान करने से माना जाता है कि व्यक्ति पापों से मुक्त होकर मृत्यु के भय से छुटकारा पा लेता है।
यमराज पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा
गरुड़ पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में एक प्रसिद्ध कथा मिलती है। कथा के अनुसार, एक बार हंसवती नामक नगर में एक राजा था, जिसका नाम था रति। उसने संयोग से यमराज के दूतों को देखा और डर गया।
रात में उसे स्वप्न में यमदूतों ने बताया कि उसे शीघ्र ही मृत्यु प्राप्त होगी, क्योंकि उसने जाने-अनजाने में कई पाप किए हैं। भयभीत राजा ने ऋषियों से उपाय पूछा। तब उन्होंने बताया कि अगर वह नरक चतुर्दशी के दिन तेल से स्नान कर यमराज को दीप अर्पण करेगा, तो उसे नरक नहीं भोगना पड़ेगा।
राजा ने ऐसा ही किया, और उसकी आत्मा को मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त हुआ।
तब से यह परंपरा बन गई कि इस दिन यमराज की पूजा करके व्यक्ति नरक के दुखों से बच सकता है।
अभ्यंग स्नान: शरीर ही नहीं, आत्मा की भी शुद्धि
इस दिन सुबह उषा काल में विशेष स्नान किया जाता है जिसे "अभ्यंग स्नान" कहा जाता है। इसमें पहले शरीर पर तेल मालिश कर, फिर उबटन और फिर स्नान किया जाता है। मान्यता है कि इससे पापों का नाश होता है और त्वचा में चमक आती है। साथ ही यह स्नान मृत्यु के भय से बचाने वाला माना जाता है।
विशेष मंत्र:
"अभींग स्नानं करिष्ये यमलोक यातनाद भयात्।"
दीपदान: यमराज के लिए विशेष दीपक
नरक चतुर्दशी की शाम को घर के बाहर या मुख्य द्वार पर एक दीपक जलाकर यमराज के नाम का दीपदान किया जाता है। यह दीपक चार मुख वाला भी हो सकता है और इसमें तिल का तेल या सरसों का तेल डाला जाता है।
इस परंपरा के पीछे मान्यता है कि यमराज के लिए दीप जलाने से परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु नहीं होती और पूर्वजों को भी शांति मिलती है।
मंत्र उच्चारण के साथ दीपदान करें:
"मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भृकुटीमुखे।
दीपदानात् प्रीयतां मे यम: धर्मपुत्रकः।"
धार्मिक महत्व और सामाजिक संदेश
यमराज की पूजा केवल पौराणिक परंपरा ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जागरूकता भी है। यह मनुष्य को स्मरण कराती है कि मृत्यु एक अटल सत्य है, लेकिन सद्कर्मों और धर्म पालन से मृत्यु भी सुखद हो सकती है।
यह पर्व हमें आत्मचिंतन, पापों की क्षमा और जीवन के मूल्य समझने की प्रेरणा देता है।
नरक चतुर्दशी केवल स्नान और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि यह आत्मा को शुद्ध करने और मृत्यु के भय से मुक्ति पाने की आध्यात्मिक साधना है। इस दिन यमराज की पूजा कर, दीपदान कर, और आत्मविश्लेषण कर, हम न केवल पापों से मुक्त हो सकते हैं, बल्कि जीवन को अधिक सकारात्मक और शांतिपूर्ण बना सकते हैं।
तो इस नरक चतुर्दशी पर, यमराज की आराधना करिए और जीवन में धर्म, सदाचार और स्वास्थ्य का दीपक जलाइए।
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