धर्म-अध्यात्म

रावण दहन के लिए प्रदोष काल क्यों माना जाता है खास? जानिए धार्मिक मान्यता

nidhi
20 Oct 2026 8:33 AM IST
रावण दहन के लिए प्रदोष काल क्यों माना जाता है खास? जानिए धार्मिक मान्यता
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रावण दहन से क्या है इसका संबंध

दशहरा 2026: विजयादशमी का पर्व भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर रामलीलाओं का समापन होता है और रावण, मेघनाद तथा कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण दहन का आयोजन आमतौर पर शाम के समय ही क्यों होता है? इसके पीछे प्रदोष काल से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हैं। परंपरा में सूर्यास्त के आसपास के इस समय को रावण दहन के लिए विशेष माना जाता है। हालांकि, आयोजन का समय स्थानीय पंचांग और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।

क्या होता है प्रदोष काल?
प्रदोष काल का संबंध सूर्यास्त के आसपास और उसके बाद आने वाले संध्या समय से है। इसे दिन से रात की ओर बढ़ने का समय समझा जा सकता है। हिंदू धार्मिक परंपराओं में संध्या को पूजा, आराधना और दीप प्रज्वलन के लिए महत्व दिया जाता है। दशहरे पर इसी समय रावण दहन करने की परंपरा भी प्रचलित है। लोकमान्यता में इस संधिकाल को नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय के प्रतीक से जोड़ा जाता है। रावण का पुतला जलाना अहंकार और अधर्म के अंत का सार्वजनिक संदेश बनता है। कुछ प्रचलित व्याख्याओं में इसे आसुरी शक्तियों के प्रभाव को रोकने का प्रतीक भी बताया जाता है। ये धार्मिक विश्वास हैं; इन्हें किसी प्रमाणित प्राकृतिक घटना के रूप में नहीं समझना चाहिए।
रावण दहन से जुड़ा क्या है संदेश?
रामकथा की परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके माता सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया था। विजयादशमी पर इसी विजय का उत्सव मनाया जाता है। रावण दहन उस प्रसंग की प्रतीकात्मक प्रस्तुति है, जिसमें अन्याय और अहंकार का अंत होता है। इस परंपरा की सीख रोजमर्रा के जीवन से भी जुड़ती है। व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली या विद्वान क्यों न हो, अपने आचरण की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। दशहरे का पर्व आत्मचिंतन का अवसर देता है कि क्रोध, लालच और अहंकार जैसी प्रवृत्तियां हमारे फैसलों पर कितना प्रभाव डालती हैं। पुतले का दहन इसी संदेश को सामूहिक उत्सव के रूप में सामने लाता है।
विजय मुहूर्त और रावण दहन का समय समझें
दशहरे के अवसर पर विजय मुहूर्त, अपराह्न पूजा और प्रदोष काल का उल्लेख मिलता है। इनके समय और धार्मिक उपयोग में अंतर है। विजयादशमी पर शमी पूजा, अपराजिता पूजा और सीमोल्लंघन जैसी परंपराएं अपराह्न काल से जुड़ी हैं। वहीं, रावण दहन के लिए संध्या और प्रदोष काल को महत्व दिया जाता है। इसलिए दोपहर के विजय मुहूर्त को देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि रावण दहन भी उसी समय होना चाहिए। पूजा की विधि और सार्वजनिक दहन कार्यक्रम का समय अलग हो सकता है। अपने शहर में आयोजित समारोह के लिए स्थानीय पंचांग तथा आयोजन समिति की घोषित समय-सारिणी देखना उपयोगी रहेगा।
वर्ष 2026 में दिल्ली के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक और अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से 3 बजकर 30 मिनट तक बताया गया है। ये समय दिल्ली के हैं और इन्हें सभी शहरों का रावण दहन मुहूर्त नहीं माना जाना चाहिए।
इस वर्ष 20 अक्टूबर को मनाया जा रहा दशहरा
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर शुरू होकर 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। दिल्ली सहित अनेक क्षेत्रों में विजयादशमी मंगलवार, 20 अक्टूबर को मनाई जा रही है। बंगाल की विजयादशमी 21 अक्टूबर को दर्शाई गई है।
इस अंतर का कारण पर्व से जुड़े तिथि निर्धारण और क्षेत्रीय परंपराएं हैं। किसी त्योहार की तारीख तय करने में केवल सूर्योदय के समय मौजूद तिथि ही नहीं, संबंधित अनुष्ठान के लिए आवश्यक काल भी देखा जाता है। विजयादशमी की पूजा में अपराह्न का महत्व इसी संदर्भ में समझा जाता है।
क्या हर जगह प्रदोष काल में ही होता है दहन?
रावण दहन के लिए प्रदोष काल को शुभ मानने की परंपरा व्यापक है, लेकिन सभी स्थानों पर आयोजन एक ही घड़ी में नहीं होता। सूर्यास्त का समय शहर के अनुसार बदलता है। स्थानीय धार्मिक परंपरा और रामलीला के कार्यक्रम के कारण भी समय में अंतर दिखाई देता है। इसलिए किसी एक शहर के लिए बताए गए समय को पूरे देश पर लागू करना उचित नहीं होगा। विजयादशमी का उत्सव भी विभिन्न क्षेत्रों में अलग स्वरूप में दिखाई देता है। कहीं रामलीला और रावण दहन प्रमुख होते हैं, तो कहीं देवी की पूजा, विसर्जन और अन्य पारंपरिक अनुष्ठानों को विशेष महत्व दिया जाता है। इन विविध रूपों के बीच पर्व का केंद्रीय भाव अन्याय पर न्याय और बुराई पर अच्छाई की विजय है। प्रदोष काल में रावण दहन की परंपरा इसी भावना की एक लोकप्रिय अभिव्यक्ति है।
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