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धर्म-अध्यात्म
"Karwa Chauth पर छलनी से ही क्यों देखा जाता है पति का चेहरा? जानिए पूजा से जुड़ा ये गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक रहस्य"
Harrison
9 Oct 2025 8:40 PM IST

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Religion Spirituality, धर्म अध्यात्म: करवा चौथ का व्रत भारतीय संस्कृति में विवाहिता महिलाओं के लिए अत्यंत श्रद्धा और आस्था का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं। पूजा की विधि में शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद महिलाएं एक विशेष अनुष्ठान करती हैं—छलनी से चंद्रमा और फिर अपने पति का चेहरा देखती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है? आखिर छलनी से ही पति का चेहरा क्यों देखा जाता है? इसका क्या धार्मिक और सांस्कृतिक रहस्य है?
इस खास रिपोर्ट में जानते हैं इस प्राचीन परंपरा के पीछे छिपा गहरा कारण।
छलनी से चंद्रमा और पति को देखने की परंपरा
करवा चौथ की पूजा में जब चंद्रमा निकलता है, तब महिलाएं सबसे पहले छलनी से चंद्रमा को देखती हैं और फिर उसी छलनी से अपने पति के दर्शन करती हैं। इसके बाद पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर व्रत खोलवाता है।
यह परंपरा प्रतीकात्मक रूप से भक्ति, समर्पण और संयम का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन इसके पीछे कई धार्मिक मान्यताएं, कथाएं और भावनात्मक पहलू भी छिपे हैं।
छलनी का धार्मिक और प्रतीकात्मक महत्व
1. धूप-छांव का प्रतीक:
छलनी की बनावट ऐसी होती है कि वह प्रकाश और अंधकार (सकारात्मक और नकारात्मक) दोनों को साथ दर्शाती है।
जब पत्नी छलनी से चंद्रमा और फिर पति को देखती है, तो यह संकेत होता है कि वह जीवन के हर अच्छे-बुरे समय में अपने पति का साथ निभाएगी।
2. संयम और समर्पण की कसौटी:
व्रत के पूरे दिन संयम और तपस्या करने के बाद पत्नी जब छलनी से पति को देखती है, तो यह उसकी आस्था और समर्पण की पूर्णता का प्रतीक होता है।
3. चंद्रमा की ऊर्जा को नियंत्रित करना:
मान्यता है कि चंद्रमा की किरणों में सौम्यता, शीतलता और मानसिक शांति होती है।
छलनी से चंद्रमा को देखने से उसकी ऊर्जा फिल्टर होकर शुद्ध रूप में आंखों और मन पर प्रभाव डालती है।
पौराणिक कथा से जुड़ा संदर्भ
करवा चौथ से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा में बताया गया है कि एक बार वीरावती नामक महिला ने करवा चौथ का व्रत रखा था। उसके भाई उसकी हालत देखकर बेचैन हो गए और उन्होंने छल से एक दर्पण को पेड़ों में टांगकर चंद्रमा का आभास कराया। वीरावती ने व्रत तोड़ा, लेकिन कुछ ही देर में उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिला।
तब उसने पश्चाताप करते हुए पूरे विधि-विधान से व्रत दोबारा रखा और अपने भक्ति-बल से पति को पुनर्जीवित कर लिया।
इस कथा में छल के कारण व्रत की सिद्धि नहीं हो पाई थी। इसलिए आज भी छलनी का प्रयोग एक तरह से 'सत्य के छनने' के प्रतीक के रूप में होता है—जिससे मन, व्रत और दर्शन, तीनों की पवित्रता बनी रहे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या कहता है?
चंद्रमा की किरणों में विशेष प्रकार की यूवी और कॉस्मिक ऊर्जा होती है।
लंबे समय तक सीधे देखने से आंखों पर विपरीत प्रभाव हो सकता है।
छलनी से देखने से किरणें फिल्टर होकर आंखों पर कम प्रभाव डालती हैं।
यह तरीका आंखों की सुरक्षा के लिहाज से भी सुरक्षित माना जाता है।
भावनात्मक और सांस्कृतिक संदेश
छलनी से पति का चेहरा देखने का तात्पर्य यह भी है कि पत्नी पति को एक दिव्य दृष्टि से देख रही है, जैसे वह उसे सिर्फ देह से नहीं, आत्मा और रिश्ते के स्तर पर देख रही हो।
यह परंपरा यह भी दर्शाती है कि एक पत्नी अपने पति के लिए हर प्रकार के संयम, बलिदान और तपस्या करने को तैयार है, पर वह यह सब सद्भावना और श्रद्धा से करती है, न कि किसी सामाजिक दबाव से। करवा चौथ की पूजा में छलनी से पति के चेहरे को देखना कोई साधारण क्रिया नहीं, बल्कि यह एक गहरी सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा है। यह नारी के समर्पण, प्रेम, धैर्य और विश्वास का प्रतीक है, जो प्राकृतिक तत्वों के साथ जुड़कर एक विशिष्ट ऊर्जा का संचार करता है।
आज भले ही जीवनशैली बदल रही हो, लेकिन ऐसी परंपराएं हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती हैं और रिश्तों की गहराई और पवित्रता को दर्शाती हैं।
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