धर्म-अध्यात्म

शरद पूर्णिमा की रात जागरण क्यों माना जाता है शुभ? जानें लक्ष्मी पूजा और महारास का संबंध

nidhi
19 Oct 2026 10:48 AM IST
शरद पूर्णिमा की रात जागरण क्यों माना जाता है शुभ? जानें लक्ष्मी पूजा और महारास का संबंध
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शरद पूर्णिमा पर जागरण की परंपरा क्यों?

धर्म डेस्क : आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला शरद पूर्णिमा का पर्व चंद्र दर्शन, मां लक्ष्मी की आराधना और भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से जुड़ा है। इस अवसर पर कई परिवारों में रात्रि जागरण की परंपरा निभाई जाती है। श्रद्धालु भजन-कीर्तन, कथा और मंत्र जाप करते हुए रात बिताते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी उपासना करने वाले भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। इसी विश्वास के कारण शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है।

इस पर्व से जुड़ा एक प्रमुख प्रश्न है कि रात में जागना इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है। इसका उत्तर कोजागर की प्रचलित कथा में मिलता है। लोकमान्यता के अनुसार, देवी लक्ष्मी इस रात पृथ्वी पर विचरण करते हुए पूछती हैं—‘को जागर्ति?’ अर्थात कौन जाग रहा है। भक्त इस प्रश्न को देवी की आराधना के अवसर के रूप में देखते हैं। इसलिए जागरण के दौरान पूजा और ईश्वर स्मरण को विशेष स्थान दिया जाता है।
मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए घर तथा पूजा स्थल की सफाई, दीप प्रज्वलन और भोग अर्पित करने की परंपरा है। कई घरों में मुख्य द्वार पर भी दीपक रखा जाता है। श्रद्धालु परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। यह धार्मिक आस्था है; जागरण को निश्चित धन प्राप्ति का उपाय मानने के बजाय उपासना और श्रद्धा की परंपरा के रूप में समझना चाहिए।
कोजागर से जुड़ी एक लोककथा में ऐसे राजा का वर्णन मिलता है, जिसका वैभव समाप्त हो गया था और परिवार आर्थिक संकट में घिर गया था। कथा के अनुसार, रानी ने आश्विन पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी का पूजन किया और श्रद्धापूर्वक जागरण रखा। देवी ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया और परिवार की स्थिति सुधर गई।
इस कथा के अलग-अलग रूप सुनने को मिलते हैं। इसका केंद्रीय भाव कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास, धैर्य और उपासना बनाए रखना है। लोककथाओं के पात्रों और घटनाओं में क्षेत्र के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए किसी एक संस्करण को सभी परंपराओं का एकमात्र विवरण नहीं माना जा सकता।
शरद पूर्णिमा का दूसरा प्रमुख धार्मिक पक्ष भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला है। ब्रज की परंपरा में इस रात को रास पूर्णिमा के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में शरद ऋतु की चांदनी रात, खिले हुए फूलों और भगवान की बांसुरी का सुंदर वर्णन मिलता है। प्रसंग के अनुसार, श्रीकृष्ण ने पूर्ण चंद्रमा की रोशनी से आलोकित वन को देखकर बांसुरी बजाई।
बांसुरी की धुन सुनकर गोपियां उनकी ओर आकर्षित हुईं और उनके पास पहुंचीं। इस वर्णन में प्रकृति का सौंदर्य और भगवान के प्रति प्रेम एक साथ दिखाई देते हैं। शरद पूर्णिमा पर महारास का स्मरण इसी भक्ति परंपरा से जुड़ा है। मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में रास पद, कृष्ण भजन तथा लीला कथाओं के माध्यम से इस प्रसंग को याद किया जाता है।
भागवत के रास वर्णन में गोपियों के मंडल के बीच श्रीकृष्ण की उपस्थिति का उल्लेख है। दशम स्कंध के अध्याय 33 के तीसरे श्लोक के अनुसार, भगवान प्रत्येक दो गोपियों के बीच प्रकट हुए। हर गोपी को अनुभव हुआ कि श्रीकृष्ण उसके पास हैं। धार्मिक व्याख्या में यह भगवान और भक्त के व्यक्तिगत संबंध का भाव प्रकट करता है। महारास के इस प्रसंग को भक्त ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण की लीला मानते हैं। प्रत्येक गोपी के साथ भगवान की उपस्थिति का वर्णन उनकी दिव्य शक्ति से जुड़ा है। इसीलिए रासलीला को समझते समय उसके आध्यात्मिक संदर्भ का ध्यान रखा जाता है।
इसी अध्याय के अंतिम श्लोक में श्रद्धापूर्वक भगवान की इस लीला को सुनने और वर्णन करने की महिमा बताई गई है। इसका संबंध भक्ति की उन्नति और सांसारिक आसक्ति से ऊपर उठने से जोड़ा गया है। इस दृष्टि से शरद पूर्णिमा का जागरण केवल उत्सव में रात बिताना नहीं, बल्कि कथा सुनने और मन को भगवान के स्मरण में लगाने का अवसर बनता है।
इस पर्व पर दूध और चावल की खीर बनाकर चांदनी में रखने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक विश्वास में शरद पूर्णिमा की चांदनी को अमृततुल्य माना गया है। अगले दिन खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। चंद्र किरणों से खीर में चमत्कारी औषधीय गुण आने की बात आस्था से जुड़ी है, इसे प्रमाणित चिकित्सकीय तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
क्षेत्र के अनुसार उत्सव का स्वरूप बदलता है। बंगाल में कोजागरी लक्ष्मी पूजा, महाराष्ट्र में चांदनी के नीचे दूध के साथ पारिवारिक आयोजन और ब्रज में रासलीला का विशेष महत्व मिलता है। कहीं अल्पना और देवी के चरण चिह्न बनाए जाते हैं, तो कहीं गीत-संगीत और कथा के साथ परिवार एकत्र होता है।
घर में इस अवसर पर श्रद्धानुसार सरल पूजा की जा सकती है। स्वच्छ स्थान पर दीपक जलाकर मां लक्ष्मी और भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें। परिवार के साथ भजन गाएं, कथा पढ़ें और प्रसाद अर्पित करें। पूजा का स्वरूप अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखें। जागरण की धार्मिक भावना को भक्ति, सद्भाव और आत्मचिंतन से जोड़कर अपनाना इस पर्व को अधिक अर्थपूर्ण बना सकता है।
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