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धर्म-अध्यात्म

क्यों जरूरी है मृत्यु के बाद पिंडदान

Sandhya Yadav
22 July 2021 9:12 AM GMT
क्यों जरूरी है मृत्यु के बाद पिंडदान
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गरुड़ पुराण सनातन धर्म के 18 महापुराणों में से एक है.

जनता से रिश्ता वेबडेस्क | गरुड़ पुराण सनातन धर्म के 18 महापुराणों में से एक है. माना जाता है कि गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के बीच बातचीत के जरिए लोगों को नीति, नियम, सदाचार, ज्ञान, तप, यज्ञ आदि की बातें बताई गई हैं. साथ ही मृत्यु के बाद के संस्कार, आत्मा और तमाम लोकों का जिक्र किया गया है. गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद शरीर के अंतिम संस्कार से लेकर पिंडदान और तेरहवीं तक का महत्व बताया गया है. यहां जानिए कि मृत्यु के बाद पिंडदान करना क्यों जरूरी है.

गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद मृत व्यक्ति की आत्मा 13 दिनों तक अपने परिजनों के बीच ही रहती है. वो फिर से शरीर में प्रवेश कर जाना चाहती है, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाती. इस दौरान आत्मा भूख और प्यास से तड़पती रहती है और रोती है. इस बीच 10 दिनों तक आत्मा को उसके परिजनोंं द्वारा जो पिंडदान किया जाता है, उससे उसका सूक्ष्म शरीर बनता है जो एक अंगूठे के बराबर के आकार का होता है.

यही सूक्ष्म शरीर 13 दिनों बाद फिर से यमलोक की यात्रा को तय करता है और वहां के शुभ और अशुभ फल को भोगता है. पहले दिन के पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन से गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से ह्रदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नौवें और दसवें दिन से भूख-प्यास आदि उत्पन्न होती है.

इस पिंडदान से आत्मा को बल प्राप्त होता है जो उसे यमलोक तक की यात्रा करने में सक्षम बनाता है. इसलिए गरुड़ पुराण में मरने वाले ​व्यक्ति के लिए दस दिनों तक पिंडदान जरूरी बताया गया है. माना जाता है कि जिस व्यक्ति के परिजन उसके लिए पिंड दान नहीं करते, ऐसे लोगों की आत्मा को यमदूत 13वें दिन घसीटते हुए यमलोक तक ले जाते हैं. ऐसा व्यक्ति प्रेत बनकर इधर उधर भटकता रहता है. पिंडदान के बाद तेरहवीं के दिन जब मृतक के परिजन 13 ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं तो आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है.

(यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया

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