धर्म-अध्यात्म

काशी में पिंडदान क्यों है खास? जानें गया से पहले की पौराणिक वजह

Tara Tandi
23 Sept 2026 5:01 PM IST
काशी में पिंडदान क्यों है खास? जानें गया से पहले की पौराणिक वजह
x
ज्योतिष न्यूज़ : पितृपक्ष 2026 में प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर की रात 10:18 बजे से आरंभ होगी और प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर को किया जाएगा। इसके साथ ही देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान का क्रम शुरू हो जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार गया, काशी, प्रयागराज और हरिद्वार जैसे तीर्थों में पूर्वजों की शांति और सद्गति की कामना से किए जाने वाले कर्मकांड का विशेष महत्व है।
श्राद्ध और पिंडदान की बात आते ही गया का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। हालांकि काशी की एक स्थानीय धार्मिक परंपरा में कुछ विशेष परिस्थितियों में गया जाने से पहले वाराणसी में श्राद्ध-पिंडदान कराने की मान्यता है। खासकर अकाल या अस्वाभाविक मृत्यु से जुड़े मामलों में इस परंपरा को महत्वपूर्ण माना जाता है।
गया से पहले काशी जाने की क्या मान्यता है?
पितृपक्ष में लोग अलग-अलग तीर्थों पर अपने पूर्वजों के लिए धार्मिक कर्मकांड करते हैं। काशी की परंपरा में माना जाता है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या या किसी अन्य असामान्य परिस्थिति में हुई हो, तो गया में पिंडदान से पहले काशी में विशेष अनुष्ठान कराया जा सकता है।
प्रेत योनि से मुक्ति की धार्मिक मान्यता
धार्मिक विश्वास के अनुसार असमय मृत्यु होने पर आत्मा के प्रेत अवस्था में रहने की मान्यता है। काशी के पिशाचमोचन कुंड और मणिकर्णिका घाट पर पिंडदान, तर्पण और त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे कर्मकांड किए जाते हैं। मान्यता है कि इन अनुष्ठानों के माध्यम से ऐसी आत्मा को प्रेत अवस्था से मुक्ति और पितृ योनि प्राप्त होने का मार्ग मिलता है।
इसी विश्वास के कारण अकाल मृत्यु के मामलों में कई परिवार पहले काशी पहुंचते हैं और इसके बाद गयाजी में पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यता में काशी के कर्मकांड को प्रेत बाधा से मुक्ति से, जबकि गया के पिंडदान को पितरों की तृप्ति और मोक्ष की कामना से जोड़ा जाता है।
पिशाचमोचन कुंड क्यों है खास?
वाराणसी का पिशाचमोचन कुंड अकाल मृत्यु से जुड़े कर्मकांडों के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यहां नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और पिंडदान जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। वहीं मणिकर्णिका घाट का संबंध काशी की प्राचीन मृत्यु और मोक्ष परंपरा से माना जाता है। कौन-सा कर्मकांड किस स्थान पर कराया जाए, यह मृत्यु की परिस्थिति, पारिवारिक परंपरा और पुरोहित की सलाह के अनुसार तय किया जा सकता है।
गयाजी में 45 वेदियों पर पिंडदान
पितृपक्ष में गयाजी में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी और अक्षयवट समेत विभिन्न वेदियों पर पिंडदान की परंपरा है। पारंपरिक गया श्राद्ध में 45 वेदियों का उल्लेख मिलता है। परिवार की परंपरा और उपलब्ध समय के अनुसार एक, तीन, पांच या अधिक दिनों तक भी कर्मकांड किए जा सकते हैं।
क्या हर व्यक्ति को पहले काशी जाना जरूरी है?
नहीं। गया से पहले काशी में पिंडदान करना सभी के लिए अनिवार्य नहीं माना जाता। यह मुख्य रूप से काशी की स्थानीय धार्मिक परंपरा और अकाल मृत्यु से जुड़े विशेष कर्मकांडों से संबंधित मान्यता है। सामान्य मृत्यु की स्थिति में परिवार अपनी कुल परंपरा के अनुसार घर या गया, प्रयागराज, हरिद्वार जैसे तीर्थों पर श्राद्ध कर सकते हैं। अकाल मृत्यु के मामलों में पिशाचमोचन तीर्थ की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित मानी जाती है।
Next Story