धर्म-अध्यात्म

मंदिर में क्यों लगाई जाती है परिक्रमा जानें श्लोक और धार्मिक महत्व

nidhi
20 Sept 2026 9:38 AM IST
मंदिर में क्यों लगाई जाती है परिक्रमा जानें श्लोक और धार्मिक महत्व
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मंदिर में परिक्रमा

धर्म डेस्क : मंदिर जाकर देवी-देवताओं के दर्शन और पूजा करने के बाद परिक्रमा करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। श्रद्धालु भगवान की प्रतिमा या मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर दक्षिणावर्त दिशा में घूमते हैं। धार्मिक मान्यता है कि परिक्रमा करने से मन में भक्ति और समर्पण का भाव मजबूत होता है। शास्त्रीय परंपरा में इसे प्रदक्षिणा भी कहा जाता है।

परिक्रमा के समय एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक बोला जाता है—
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे॥
इसका सामान्य अर्थ है कि वर्तमान और पूर्व जन्मों में किए गए पाप प्रत्येक प्रदक्षिणा के कदम के साथ नष्ट हों। यह धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक मान्यता से जुड़ा श्लोक है। श्रद्धालु इसे भगवान से क्षमा और आत्मशुद्धि की प्रार्थना के रूप में भी पढ़ते हैं।
क्यों की जाती है परिक्रमा?
धार्मिक दृष्टि से परिक्रमा का अर्थ केवल भगवान के चारों ओर घूमना नहीं है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ है कि भक्त भगवान को अपने जीवन का केंद्र मानता है। जिस तरह परिक्रमा करते समय श्रद्धालु का मार्ग देव प्रतिमा के चारों ओर रहता है, उसी तरह वह अपने जीवन और विचारों के केंद्र में ईश्वर को रखने का संकल्प व्यक्त करता है।
आमतौर पर परिक्रमा दक्षिणावर्त यानी घड़ी की दिशा में की जाती है। इस दौरान भगवान या पूजनीय स्थान श्रद्धालु के दाईं ओर रहता है। 'प्रदक्षिणा' शब्द में 'दक्षिण' का संबंध भी इसी परंपरा से जोड़ा जाता है। मंदिरों में उपलब्ध स्थान और संबंधित धार्मिक परंपरा के अनुसार परिक्रमा का तरीका अलग हो सकता है।
परिक्रमा करते समय श्रद्धालुओं को शांत मन से भगवान का स्मरण करने की सलाह दी जाती है। कई लोग मंत्र या अपने आराध्य का नाम जपते हुए परिक्रमा करते हैं। मान्यता है कि इससे मन एकाग्र होता है और पूजा के दौरान व्यक्ति का ध्यान बाहरी विचारों से हटकर आराध्य पर केंद्रित रहता है।
कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?
अलग-अलग देवी-देवताओं और धार्मिक परंपराओं में परिक्रमा की संख्या को लेकर अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। इसलिए किसी एक संख्या को सभी मंदिरों के लिए अनिवार्य नियम नहीं माना जा सकता। किसी विशेष मंदिर में वहां की स्थानीय परंपरा और पुजारी द्वारा बताए गए नियम का पालन किया जा सकता है।
भगवान शिव की परिक्रमा के संबंध में विशेष परंपरा देखने को मिलती है। कई शिव मंदिरों में शिवलिंग की जलाधारी से निकलने वाली जलधारा यानी सोमसूत्र को पार नहीं किया जाता और उसी के अनुसार परिक्रमा पूरी की जाती है। मंदिर की संरचना और परंपरा के आधार पर इसका तरीका अलग हो सकता है।
इस तरह मंदिर में परिक्रमा आस्था, समर्पण और ईश्वर को जीवन के केंद्र में रखने का प्रतीक मानी जाती है। पाप मुक्ति से जुड़ा श्लोक भी इसी आध्यात्मिक भावना को व्यक्त करता है।

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