धर्म-अध्यात्म

मां दुर्गा को क्यों कहते हैं महिषासुरमर्दिनी? ब्रह्मा के वरदान से जुड़ी है कथा

nidhi
16 Oct 2026 10:10 AM IST
मां दुर्गा को क्यों कहते हैं महिषासुरमर्दिनी? ब्रह्मा के वरदान से जुड़ी है कथा
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मां दुर्गा ने उसी के अनुसार किया अंत
नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना उनके अनेक नामों और स्वरूपों में की जाती है। इन्हीं में एक प्रसिद्ध नाम है ‘महिषासुरमर्दिनी’, जिसका अर्थ है महिषासुर का मर्दन अर्थात उसका संहार करने वाली देवी। पौराणिक परंपरा में यह नाम उस विजय से जुड़ा है, जिसमें देवी ने अत्याचारी असुर महिषासुर का अंत कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। देवी माहात्म्य की कथा में उनका यह पराक्रमी स्वरूप प्रमुखता से सामने आता है।
प्रचलित कथा के अनुसार, महिषासुर अत्यंत शक्तिशाली असुर था। वह अपनी शक्ति को अजेय बनाना चाहता था, इसलिए उसने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट हुए और उससे वर मांगने को कहा। महिषासुर ने सबसे पहले अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्माजी ने समझाया कि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है, इसलिए अमरता का वरदान देना संभव नहीं है।
इसके बाद महिषासुर ने ऐसा वर मांगा कि किसी देवता, पुरुष या असुर के हाथों उसकी मृत्यु न हो; उसका अंत केवल किसी स्त्री के हाथों हो सके। ब्रह्माजी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। महिषासुर ने स्त्री शक्ति को कमतर समझते हुए मान लिया कि अब उसे कोई पराजित नहीं कर सकेगा। यही विश्वास धीरे-धीरे उसके अहंकार और अत्याचार का आधार बन गया।
वरदान मिलने के बाद उसने देवताओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। इंद्र के नेतृत्व में देवता उसका सामना नहीं कर सके और पराजित हो गए। महिषासुर के बढ़ते अत्याचारों से परेशान देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से रक्षा की प्रार्थना की। कथा के अनुसार, देवताओं की संयुक्त दिव्य ऊर्जा से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। जिस स्त्री शक्ति को महिषासुर ने कमजोर माना था, वही उसके अंत का कारण बनने वाली थी।
देवी के प्रकट होने पर देवताओं ने उन्हें अपने दिव्य अस्त्र प्रदान किए। हिमालय ने उन्हें सिंह वाहन दिया। अस्त्रों से सुसज्जित देवी ने महिषासुर की सेना का सामना किया। प्रचलित वर्णन में महिषासुर युद्ध के दौरान बार-बार रूप बदलकर देवी को भ्रमित करने का प्रयास करता है, लेकिन उसकी योजनाएं सफल नहीं होतीं।
देवी माहात्म्य के वर्णन में महिषासुर भैंसे का रूप धारण कर देवी पर आक्रमण करता है। देवी उसे दबाकर अपने शस्त्रों से उसका संहार करती हैं। महिषासुर का अंत होने पर देवता उनकी स्तुति करते हैं। इसी विजय के कारण देवी महिषासुरमर्दिनी कहलाती हैं। विभिन्न पौराणिक और क्षेत्रीय कथाओं में युद्ध के कुछ विवरण अलग मिलते हैं, लेकिन देवी द्वारा महिषासुर के संहार का मूल प्रसंग समान है।
इस कथा को अहंकार और अन्याय पर शक्ति की विजय के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है। महिषासुर का अभिमान उसे अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने की ओर ले गया। देवी का स्वरूप यह संदेश देता है कि स्त्री शक्ति को कमजोर समझना अज्ञान है। नवरात्र में इस विजयगाथा का स्मरण भक्तों को अपने भीतर की विनाशकारी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण और साहस के साथ कठिनाइयों का सामना करने की प्रेरणा देता है।
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