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धर्म-अध्यात्म
हिमाचल में क्यों दिवाली के एक महीने बाद मनाई जाती है ‘Budhi Diwali’? जानें वजह
Harrison
22 Oct 2025 8:47 PM IST

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Religion Spirituality,धर्म अध्यात्म :भारत विविधताओं से भरा देश है, जहाँ हर राज्य, हर क्षेत्र अपनी खास परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ त्योहारों को मनाता है। ऐसा ही एक अनोखा त्योहार है ‘बूढ़ी दिवाली’, जिसे देश के बाकी हिस्सों से करीब एक महीना बाद मनाया जाता है। यह परंपरा विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, सिरमौर और कुछ अन्य पहाड़ी इलाकों में निभाई जाती है।
जब देशभर में दीपावली के दीप बुझ चुके होते हैं, तब हिमाचल के इन क्षेत्रों में शुरू होता है रोशनी, रंग और संस्कृति का एक नया उत्सव — बूढ़ी दिवाली। यह परंपरा केवल समय में अलग नहीं, बल्कि अपने रूप, रंग और मान्यताओं में भी विशिष्ट है।
कब मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली?
बूढ़ी दिवाली हर साल कार्तिक मास की अमावस्या के एक महीने बाद, मार्गशीर्ष मास की अमावस्या को मनाई जाती है। 2025 में यह पर्व 26 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन लोग रात को घरों में दीप जलाते हैं, पकवान बनाते हैं, नाच-गाना होता है और देवताओं की पूजा की जाती है।
कहां मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली?
बूढ़ी दिवाली हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, सिरमौर, शिमला, मंडी और चंबा जिलों के कुछ गांवों में बड़े हर्षोल्लास से मनाई जाती है। इस दिन गांवों में पारंपरिक वेशभूषा में लोग इकट्ठा होते हैं, लोक नृत्य करते हैं और सामूहिक भोज का आयोजन होता है।
क्यों मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली?
इसके पीछे कई पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं:
1. देरी से सूचना पहुंचने की कथा:
कहा जाता है कि जब श्रीराम रावण का वध कर अयोध्या लौटे और दिवाली मनाई गई, तब हिमालय के इन दूरदराज़ के क्षेत्रों में यह सूचना काफी देर से पहुंची। उस समय संचार के आधुनिक साधन नहीं थे, इसलिए राम के लौटने की खबर महीनों बाद इन क्षेत्रों में पहुंची। उसी खुशी में उन्होंने दिवाली देर से मनाई और यह परंपरा आज भी कायम है।
2. कुल्लू के देव संस्कृति से जुड़ाव:
कुल्लू क्षेत्र में देव संस्कृति का गहरा प्रभाव है। मान्यता है कि इस दिन देवताओं को गाँव में आमंत्रित किया जाता है और उन्हें सम्मान देकर नृत्य-गान के साथ वापस भेजा जाता है। यहां के लोग मानते हैं कि यह दिवाली उनके स्थानीय देवताओं के आगमन और विदाई का प्रतीक है।
3. कृषि चक्र और मौसम के कारण:
हिमाचल के कई इलाकों में दिवाली के समय धान की कटाई या अन्य कृषि कार्यों का समय होता है। ऐसे में त्यौहार की पूरी तैयारी नहीं हो पाती। इसलिए फसल कटने के बाद, विश्राम और खुशी के समय में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है।
कैसे मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली?
गांवों में आग जलाकर उसके चारों ओर लोकनृत्य किया जाता है।
लोग पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ गीत गाते हैं।
रात भर चलने वाला यह उत्सव सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले लेता है।
ग्रामीण अपने देवताओं की झांकियां निकालते हैं और पारंपरिक व्यंजन बनाते हैं।
कुछ क्षेत्रों में दैत्यों और बुराई के प्रतीक पुतले भी जलाए जाते हैं।
बूढ़ी दिवाली सिर्फ एक देरी से मनाया गया त्योहार नहीं, बल्कि यह हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत, आस्था और परंपरा का प्रतीक है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि त्योहार सिर्फ तारीखों पर नहीं, भावनाओं पर आधारित होते हैं। यह भी दर्शाता है कि भारत की विविध संस्कृति में एक ही त्योहार कितने अलग-अलग रूपों में मनाया जा सकता है।
यदि आप भी कभी हिमाचल जाएं और बूढ़ी दिवाली के दौरान वहां मौजूद हों, तो इस अनोखे पर्व का हिस्सा जरूर बनें — क्योंकि यहाँ दीपों से नहीं, परंपरा और लोकसंस्कृति से रोशन होती है दिवाली।
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