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धर्म-अध्यात्म
अहोई माता को क्यों माना जाता है बच्चों की रक्षक जानें व्रत का महत्व
nidhi
1 Nov 2026 10:42 AM IST
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अहोई माता
धर्म डेस्क: अहोई अष्टमी का पर्व माताओं की अपनी संतान के प्रति ममता, समर्पण और मंगलकामना से जुड़ा है। वर्ष 2026 में यह व्रत रविवार एक नवंबर को रखा जा रहा है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाए जाने वाले इस पर्व पर माताएं बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की प्रार्थना करती हैं। दिनभर उपवास के बाद शाम को अहोई माता की पूजा और व्रत कथा सुनने की परंपरा है। उत्तर भारत में विशेष महत्व रखने वाले इस पर्व को कई स्थानों पर अहोई आठे भी कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं में अहोई माता को देवी पार्वती का स्वरूप माना जाता है। उनकी आराधना संतान की रक्षा और परिवार के कल्याण की कामना से की जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता का आशीर्वाद बच्चों को संकटों से बचाता है और उनके जीवन में सुख-समृद्धि लाता है। यही मान्यता इस व्रत का मुख्य आधार है। अहोई माता की पूजा का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में कुछ भिन्न हो सकता है, लेकिन संतान के मंगल की प्रार्थना सभी परंपराओं में प्रमुख रहती है।
अहोई माता के पूजन में उनका चित्र विशेष महत्व रखता है। कई घरों में दीवार पर गेरू से आठ कोष्ठकों वाली आकृति बनाई जाती है। इसके पास साही और उसके बच्चों का चित्र भी बनाया जाता है। साही को स्थानीय बोलियों में सेही, स्याहु या स्याऊ भी कहा जाता है। कुछ परिवार तैयार चित्र या कपड़े पर बनी आकृति स्थापित करते हैं। चांदी की अहोई बनवाकर पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है। ये प्रतीक पर्व से जुड़ी लोककथाओं और पारिवारिक रीति-रिवाजों का हिस्सा हैं।
संतान की लंबी उम्र के लिए यह व्रत क्यों रखा जाता है, इसका संबंध इसकी प्रचलित कथा से समझा जाता है। एक लोककथा के अनुसार एक महिला दीपावली से पहले घर की तैयारी के लिए मिट्टी लेने गई थी। मिट्टी खोदते समय अनजाने में उसके हाथों साही के बच्चे की मृत्यु हो गई। इस घटना से महिला बहुत दुखी हुई। बाद में उसके परिवार पर संकट आए और उसने अपनी पीड़ा गांव की बुजुर्ग महिलाओं को बताई। उन्होंने उसे पश्चाताप करने और अहोई माता की आराधना करने की सलाह दी।
कथा के एक रूप में बताया जाता है कि महिला ने कार्तिक कृष्ण अष्टमी को उपवास करके माता से क्षमा मांगी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने संतान के कल्याण का आशीर्वाद दिया और उसके जीवन में सुख लौट आया। अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के घटनाक्रम और अंत में अंतर मिलता है। कहीं संतान के सकुशल लौटने तो कहीं दोबारा संतान सुख मिलने का वर्णन है। इन कथाओं का साझा संदेश पश्चाताप, करुणा और जीवों की रक्षा है। इन्हें धार्मिक लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में समझा जाता है।
एक अन्य प्रचलित कथा साहूकार की बेटी और छोटी बहू से जुड़ी है। इसमें स्याऊ के बच्चे की अनजाने में मृत्यु और छोटी बहू के त्याग का वर्णन आता है। आगे जीवों की सेवा और सहायता के माध्यम से उसे आशीर्वाद मिलने की बात कही जाती है। इस कथा में भी दूसरों की संतान के प्रति संवेदनशीलता का भाव प्रमुख है। इसीलिए अहोई अष्टमी के प्रसंग में केवल अपने बच्चों के कल्याण की प्रार्थना के साथ जीवदया का संदेश भी मिलता है।
पूजा की शुरुआत सामान्यतः सुबह स्नान और व्रत के संकल्प से होती है। शाम को स्वच्छ स्थान पर अहोई माता का चित्र स्थापित कर दीप जलाया जाता है। रोली, अक्षत, फूल और जल अर्पित किए जाते हैं। भोग में परिवार की परंपरा के अनुसार दूध-चावल, फल, मिठाई अथवा घर में बने पकवान रखे जाते हैं। इसके बाद व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। कई परिवारों में घर की बुजुर्ग महिलाएं कथा सुनाती हैं और पूजा की परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं।
अहोई अष्टमी की एक प्रमुख पहचान शाम को तारों को अर्घ्य देना है। बहुत से परिवारों में तारे दिखाई देने के बाद पूजा पूरी कर व्रत का पारण किया जाता है। वहीं कुछ घरों में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। इसलिए सभी परिवारों की पूजा और पारण की विधि एक जैसी नहीं होती। स्थानीय रीति और घर की स्थापित परंपरा का इसमें महत्व रहता है। पूजा के दौरान संतान के अच्छे स्वास्थ्य, उज्ज्वल भविष्य और सुखद जीवन की कामना की जाती है।
अहोई अष्टमी का भाव बेटों और बेटियों दोनों की खुशहाली से जुड़ा है। पहले कई परिवारों में इसे मुख्य रूप से पुत्र की दीर्घायु की कामना से किया जाता था, जबकि अब सभी बच्चों के कल्याण के लिए व्रत रखने की परंपरा भी व्यापक है। इस पर्व की कथाएं ममता के साथ जिम्मेदारी और संवेदना का संदेश देती हैं। माता की आराधना करते हुए परिवार बच्चों के सुरक्षित और सुखमय भविष्य की प्रार्थना करता है। श्रद्धा, पारिवारिक सहभागिता और जीवों के प्रति करुणा इस पर्व के सांस्कृतिक महत्व को विशेष बनाते हैं।
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