धर्म-अध्यात्म

जहां महिलाएं खुद करती हैं पितरों का पिंडदान, जानें सीता कुंड की मान्यता

Alisha
4 Oct 2026 5:12 PM IST
जहां महिलाएं खुद करती हैं पितरों का पिंडदान, जानें सीता कुंड की मान्यता
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मिर्जापुर। धर्मनगरी काशी और प्रयाग के मध्य स्थित विंध्याचल धाम केवल धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र ही नहीं है, बल्कि यहां कई ऐसे प्राचीन तीर्थ और धार्मिक स्थल भी हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। इन्हीं पवित्र स्थलों में सीता कुंड का विशेष महत्व बताया जाता है। मान्यता है कि मातृ नवमी के अवसर पर यहां महिलाएं स्वयं अपने पितरों का पिंडदान और तर्पण करती हैं। खास तौर पर महिलाएं अपनी सास, पूर्वजों और परिवार के दिवंगत सदस्यों की आत्मा की शांति तथा सद्गति की कामना लेकर सीता कुंड पहुंचती हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सीता कुंड का संबंध माता सीता से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि वनवास काल के दौरान माता सीता ने यहां अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया था। इसी वजह से यह स्थान महिलाओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र माना जाता है। आज भी यहां पहुंचने वाली महिलाएं श्रद्धा और विधि-विधान के साथ पितरों को जल अर्पित करती हैं और उनके लिए पिंडदान एवं तर्पण की धार्मिक प्रक्रिया पूरी करती हैं।
माता सीता से जुड़ी है प्राचीन मान्यता
सीता कुंड को लेकर प्रचलित धार्मिक कथा के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम और माता सीता से जुड़े प्रसंगों की वजह से यह क्षेत्र पवित्र माना गया। मान्यता है कि एक अवसर पर माता सीता ने अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया था। इसी धार्मिक परंपरा से इस स्थान का नाम सीता कुंड पड़ा और समय के साथ यह पितरों के तर्पण से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया।श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां श्रद्धापूर्वक किया गया तर्पण पितरों को शांति प्रदान करता है। यही वजह है कि विशेष तिथियों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु सीता कुंड पहुंचते हैं। मातृ नवमी के दिन इस स्थान पर महिलाओं की विशेष मौजूदगी देखने को मिलती है।
मातृ नवमी पर महिलाओं की विशेष आस्था
मातृ नवमी पितृ पक्ष से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। इस दिन विशेष रूप से परिवार की माताओं और महिलाओं से जुड़े पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। सीता कुंड पर इस दिन महिलाएं अपने परिवार के दिवंगत सदस्यों को याद करते हुए तर्पण और पिंडदान करती हैं।यहां आने वाली महिलाएं अपने पितरों के लिए जलांजलि अर्पित करती हैं। कई महिलाएं अपनी सास और परिवार की अन्य दिवंगत महिलाओं की आत्मा की शांति के लिए भी पूजा-अर्चना करती हैं। धार्मिक मान्यता में इसे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम माना जाता है।सीता कुंड की यह परंपरा इसलिए भी अलग मानी जाती है क्योंकि यहां महिलाएं स्वयं पितरों के लिए धार्मिक अनुष्ठान करती हैं। इससे जुड़ी मान्यता पीढ़ियों से चली आ रही है और स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं में भी इसकी गहरी आस्था है।
अविरल जलधारा और चरण चिह्न की मान्यता
सीता कुंड की धार्मिक पहचान यहां मौजूद जलधारा से भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि यहां आज भी जल की अविरल धारा मौजूद है। श्रद्धालु इस जल को पवित्र मानते हैं और इसी के माध्यम से अपने पितरों को जल अर्पित करते हैं।इसके अलावा यहां माता सीता के चरण चिह्न होने की भी धार्मिक मान्यता है। श्रद्धालुओं के लिए ये चरण चिह्न आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र हैं। महिलाएं पूजा और तर्पण के दौरान इनका स्मरण करती हैं तथा माता सीता से अपने परिवार की सुख-शांति और पूर्वजों की सद्गति की प्रार्थना करती हैं।
पितरों की सद्गति के लिए करती हैं तर्पण
धार्मिक परंपराओं में तर्पण का विशेष महत्व बताया गया है। इसका उद्देश्य अपने पूर्वजों का स्मरण करना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना माना जाता है। सीता कुंड पर आने वाली महिलाएं भी इसी भावना के साथ जलांजलि अर्पित करती हैं।कई श्रद्धालुओं का मानना है कि पितरों के निमित्त किए गए धार्मिक कर्म से परिवार पर पूर्वजों का आशीर्वाद बना रहता है। मातृ नवमी के दिन विशेष रूप से उन महिलाओं को याद किया जाता है, जिनका परिवार में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस दौरान उनके लिए पूजा, तर्पण और प्रार्थना की जाती है।
आज भी कायम है परंपरा
आधुनिक दौर में धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में बदलाव के बावजूद सीता कुंड से जुड़ी यह परंपरा आज भी कायम है। मातृ नवमी के अवसर पर महिलाएं यहां पहुंचकर श्रद्धा के साथ अपने पूर्वजों को याद करती हैं। कोई अपनी सास के लिए तर्पण करती है तो कोई अपनी मां, दादी, नानी या परिवार की अन्य दिवंगत महिलाओं की आत्मा की शांति के लिए जल अर्पित करती है।सीता कुंड की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि पूर्वजों और मातृ शक्ति के प्रति श्रद्धा से जुड़े स्थान के रूप में भी बनी हुई है। माता सीता से जुड़ी मान्यता, पवित्र जलधारा और पितरों के तर्पण की परंपरा इसे विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करती है।यही कारण है कि मातृ नवमी के अवसर पर सीता कुंड में महिलाओं की आस्था विशेष रूप से दिखाई देती है। यहां पहुंचकर वे अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करती हैं, जलांजलि देती हैं और परिवार की सुख-शांति के साथ पितरों की सद्गति की कामना करती हैं।
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