धर्म-अध्यात्म

रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के बीच कब मनाएं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव?

Ratna Netam
5 Aug 2026 3:15 PM IST
रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के बीच कब मनाएं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव?
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नई दिल्ली : भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व इस वर्ष भी पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व हर वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में भगवान श्रीकृष्ण का **5253वां जन्मोत्सव** मनाया जाएगा। मंदिरों में विशेष सजावट, भजन-कीर्तन, झांकियां और मध्यरात्रि में भगवान के जन्मोत्सव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। हालांकि इस बार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के अलग-अलग संयोग के कारण जन्माष्टमी की तिथि को लेकर लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि **4 सितंबर 2026 को देर रात 2 बजकर 25 मिनट पर प्रारंभ होगी और 5 सितंबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी।** उदया तिथि के आधार पर अधिकांश स्थानों पर **4 सितंबर** को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। वहीं वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी **5 सितंबर** को जन्माष्टमी का उत्सव मनाएंगे। यही कारण है कि इस बार दो अलग-अलग तिथियों पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का आयोजन देखने को मिलेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र और आधी रात के समय मथुरा की कारागार में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी के दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पूजा-अर्चना कर व्रत का समापन करते हैं। इस अवसर पर लड्डू गोपाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है और उन्हें पालने में झुलाया जाता है।
इस वर्ष जन्माष्टमी का **निशीथ पूजा मुहूर्त 4 सितंबर की रात 11:57 बजे से 5 सितंबर की रात 12:43 बजे तक** रहेगा। इस अवधि को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है। श्रद्धालु इसी शुभ मुहूर्त में बाल गोपाल का अभिषेक, पूजन और आरती करेंगे।
जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु **5 सितंबर 2026** को सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करेंगे। पंचांग के अनुसार उस दिन सूर्योदय सुबह **5 बजकर 47 मिनट** पर होगा। धार्मिक परंपरा के अनुसार मध्यरात्रि में भगवान के जन्म के बाद पूजा पूरी करने के पश्चात अगले दिन सूर्योदय के बाद ही व्रत खोला जाता है।
पूजा-विधि की बात करें तो जन्माष्टमी के दिन सबसे पहले घर के मंदिर या पूजा स्थल की साफ-सफाई कर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल को स्थापित किया जाता है। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से उनका पंचामृत अभिषेक किया जाता है। फिर उन्हें नए अथवा स्वच्छ वस्त्र पहनाकर मुकुट, बांसुरी, मोरपंख और आभूषणों से सजाया जाता है। भगवान को माखन-मिश्री, फल, मिठाई, पंचामृत और अन्य प्रिय भोग अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद शंख और घंटी बजाकर आरती की जाती है तथा लड्डू गोपाल को झूले में झुलाया जाता है। अंत में प्रसाद वितरित किया जाता है।
देशभर के प्रमुख कृष्ण मंदिरों जैसे मथुरा, वृंदावन, द्वारका, नाथद्वारा, इस्कॉन मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों पर जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। मंदिरों में आकर्षक झांकियां सजाई जाएंगी, भजन-कीर्तन होंगे और हजारों श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए पहुंचेंगे। कई स्थानों पर दही-हांडी प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।
धार्मिक ग्रंथों में जन्माष्टमी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक जन्माष्टमी का व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करता है, उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं और उसे सुख, समृद्धि तथा आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
हालांकि विभिन्न पंचांगों और परंपराओं के अनुसार तिथियों में अंतर हो सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय मंदिर, धार्मिक संस्थान या विद्वान आचार्य द्वारा बताए गए मुहूर्त और परंपरा के अनुसार ही जन्माष्टमी का पर्व मनाना चाहिए। इस वर्ष भी देशभर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव श्रद्धा, उल्लास और भक्ति के वातावरण में मनाए जाने की तैयारी जोरों पर है।
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