धर्म-अध्यात्म

बलराम जयंती पर हल न चलाने की परंपरा का क्या है धार्मिक महत्व

nidhi
1 Sept 2026 1:18 PM IST
बलराम जयंती पर हल न चलाने की परंपरा का क्या है धार्मिक महत्व
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हलषष्ठी
नई दिल्ली: हिंदू धर्म में हलषष्ठी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। इसे हल छठ, ललही छठ और बलराम जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम की पूजा की जाती है। मान्यता है कि हलषष्ठी के दिन खेतों में हल चलाना और हल से जुड़ी खेती करना शुभ नहीं माना जाता।
बलराम जयंती से जुड़ी है परंपरा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान बलराम का प्रमुख अस्त्र हल और मूसल था। उन्हें कृषि और किसानों का संरक्षक माना जाता है। इसलिए इस दिन हल की पूजा की जाती है और कृषि कार्यों से जुड़े लोग भगवान बलराम का आशीर्वाद लेते हैं।
क्यों नहीं चलाया जाता खेतों में हल?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, हलषष्ठी के दिन धरती माता को विश्राम दिया जाता है। इसी कारण इस दिन खेतों में हल चलाने, जुताई करने और भूमि को नुकसान पहुंचाने वाले कार्यों से बचने की परंपरा है।
कहा जाता है कि यह दिन खेती के साधनों और प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट करने का अवसर है।
हल से जुड़ा अन्न खाने की भी मनाही
हलषष्ठी व्रत रखने वाली महिलाएं इस दिन हल से जुती हुई भूमि में पैदा हुए अनाज और सब्जियों का सेवन नहीं करतीं। कई स्थानों पर इस दिन फल, विशेष प्रकार के चावल और प्राकृतिक रूप से मिलने वाले खाद्य पदार्थ ग्रहण करने की परंपरा है।
संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है व्रत
हलषष्ठी व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखती हैं। इस दिन भगवान बलराम, हलषष्ठी माता और अन्य देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।
पूजा में हल का महत्व
इस दिन किसान अपने कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं। हल को भगवान बलराम का प्रतीक मानकर उसका सम्मान किया जाता है। यह पर्व किसानों और कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
परंपरा का संदेश
हलषष्ठी केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि प्रकृति, भूमि और कृषि के प्रति कृतज्ञता जताने का अवसर भी है। यह परंपरा इंसान को धरती और खेती के महत्व को समझने का संदेश देती है।
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