धर्म-अध्यात्म

क्या है महालया? इसी दिन माता दुर्गा की आंखों में रंग भरते हैं मूर्तिकार

Tara Tandi
6 Oct 2021 12:52 PM GMT
क्या है महालया? इसी दिन माता दुर्गा की आंखों में रंग भरते हैं मूर्तिकार
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महालया का हिंदू धर्म में काफी महत्व है.

जनता से रिश्ता वेबडेस्क | महालया का हिंदू धर्म में काफी महत्व है. महालया (Mahalaya) के साथ ही दुर्गा पूजा की शुरुआत हो जाएगी. इस दिन को नवरात्रि और पितृ पक्ष (Pitru Paksha) का संधिकाल भी कहा जाता है. इस दिन माता दुर्गा की वंदना करके उनसे अपने घर आगमन के लिए प्रार्थना की जाती है और पितरों को जल तिल देकर उन्हें नमन किया जाता है. दुर्गा पूजा के पहले महालया का अपना एक खास महत्व है. बंगाल में इस दिन को लोग खास तरीके से मनाते हैं. इसके साथ ही जिन राज्यों में दुर्गा पूजा धूमधाम से मनाया जाता है उन राज्यों में भी महालया का विशेष महत्व है. लोग महालया का साल भर इंतजार करते हैं.

क्या है महालया?

हिंदू शास्त्रों के अनुसार महालया और पितृ पक्ष अमावस्या एक ही दिन मनाई जाती है. इस बार यह 6 अक्टूबर को मनाया जा रहा है. माना जाता है कि महालया के दिन ही हर मूर्तिकार मां दुर्गा (Maa Durga) की आंखें तैयार करता है. इसके बाद से मां दुर्गा की मूर्तियों को अंतिम रूप दिया जाता है. दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की प्रतिमा का विशेष महत्व है और यही प्रतिमाएं पंडालों की शोभा बढ़ाती हैं. इस बार मां दुर्गा का पावन सप्ताह 7 अक्टूबर से शुरू हो रहा है जबकि मां दुर्गा की विशेष पूजा 11 अक्टूबर से शुरू होकर 15 अक्टूबर दशमी (Vijayadashami) तक चलती रहेगी.

पृथ्वी पर आती हैं माता पार्वती

मान्यता है कि नवरात्र में देवी पार्वती अपनी शक्तियों और 9 रूपों में साक्षात धरती पर आती हैं. इनके साथ इनकी सहचर योगनियां और पुत्र गणेश एवं कार्तिकेय भी पृथ्वी पर पधारते हैं. पृथ्वी को देवी पार्वती का माइका कहा जाता है. माता अपने माइके में आती हैं और नवरात्र के 9 दिनों में पृथ्वी पर वास करते हुए आसुरी शक्तियों का भी नाश करती हैं.

बंगालियों में है खास महत्व

महालया का महत्व बंगाली समुदायों में कुछ खास ही है. वहां इसे धूमधाम से मनाया जाता है. मां दुर्गा में आस्था रखने वाले लोग इस दिन का लगातार इंतजार करते हैं और महालय के साथ ही दुर्गा पूजा की शुरुआत करते हैं. महालया नवरात्रि और दुर्गा पूजा के शुरुआत का दिन है. कहा जाता है कि महालया के दिन ही पितरों को विदाई दी जाती है और माता का धरती पर स्वागत किया जाता है.

कैलाश छोड़ धरती पर आती हैं माता

माना जाता है कि माता नवरात्रि में धरती पर आने के लिए महालया के दिन ही कैलाश पर्वत से सपरिवार विदा हो कर नीचे आती हैं. इसलिए महालया के दिन माता के स्वागत के लिए इनकी खास प्रार्थना की जाती है. हर साल नवरात्रि प्रारंभ के दिन के हिसाब से माता का वाहन अलग-अलग होता है. इस बार गुरुवार को नवरात्रि आरंभ होने से माता डोली में बैठकर आ रही हैं.

डोली में आ रही हैं माता

इस साल माता डोली में बैठकर आ रही हैं. लेकिन ज्योतिषी और धार्मिक दृष्टि से माता का डोलीमें आना अच्छा नहीं माना जाता है. विद्वान ज्योतिष मानते हैं कि जैसे डोली डोलते हुए चलती है वैसे ही जिस साल माता डोली में चढकर आती हैं उस वर्ष धरती पर काफी उथल-पुथल की स्थिति मचती है. माता के डोली में आने से राजनीति में कई स्थापित सत्ताओं का परिवर्तन हो जाता है. राजाओं का छत्र भंग होता है यानी उनकी सत्ता चली जाती है. महामारी और रोग का प्रकोप बढता है.

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