- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- धर्म-अध्यात्म
- /
- सिंहोरा के बिना अधूरी...
धर्म-अध्यात्म
सिंहोरा के बिना अधूरी मानी जाती हैं शादियां जानें इसकी खास मान्यता
nidhi
4 Sept 2026 1:00 PM IST

x
सुहाग की निशानी सिंहोरा की परंपरा
पटना: बिहार की शादियों में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो सदियों से चली आ रही हैं और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं। इन्हीं में से एक है ‘सिंहोरा’, जो सुहाग और वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है। बिहार की पारंपरिक शादियों में सिंहोरा के बिना विवाह की रस्में अधूरी मानी जाती हैं।
सिंहोरा खासतौर पर सुहागिन महिलाओं से जुड़ी परंपरा है। इसमें सिंदूर रखने के लिए एक विशेष डिब्बे का इस्तेमाल किया जाता है। मान्यता है कि यह पति-पत्नी के रिश्ते, सौभाग्य और परिवार की खुशहाली का प्रतीक होता है।
खरीदारी के समय दूल्हा नहीं छू सकता सिंहोरा
बिहार की कई जगहों पर मान्यता है कि सिंहोरा खरीदते समय दूल्हे को इसे छूना नहीं चाहिए। इसे दुल्हन पक्ष की महिलाएं या परिवार की बड़ी महिलाएं ही खरीदती हैं। शादी के बाद इसे दुल्हन को सौंपा जाता है और वह इसमें सिंदूर रखती है।
बनाने की प्रक्रिया है खास
सिंहोरा को बनाने में भी विशेष कला और मेहनत लगती है। पारंपरिक रूप से इसे लकड़ी, मिट्टी या धातु से बनाया जाता है। कारीगर इसे आकार देने के बाद सुंदर नक्काशी और रंगों से सजाते हैं। कई सिंहोरा पर लोक कला और धार्मिक प्रतीक भी बनाए जाते हैं।
बिहार के ग्रामीण इलाकों में आज भी कई कारीगर इस परंपरागत कला को जीवित रखे हुए हैं।
सुहाग और संस्कृति का प्रतीक
सिंहोरा सिर्फ एक डिब्बा नहीं बल्कि बिहार की संस्कृति और महिलाओं की आस्था से जुड़ा प्रतीक है। शादी के बाद महिलाएं इसमें सिंदूर रखती हैं और इसे अपने वैवाहिक जीवन की निशानी के रूप में संभालकर रखती हैं।
बदलते समय में भी कायम परंपरा
आधुनिक दौर में शादी की कई रस्मों में बदलाव आया है, लेकिन सिंहोरा की परंपरा अब भी बिहार के कई क्षेत्रों में मजबूती से कायम है। यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और विरासत से जोड़ने का काम करती है।
Next Story





