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Religion Spirituality, धर्म अध्यात्म: हिंदू पंचांग के अनुसार, उत्पन्ना एकादशी एक महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से आर्थिक समृद्धि, परिवार में सुख-शांति और आत्मिक उन्नति के लिए माना जाता है। 2025 में उत्पन्ना एकादशी 8 नवंबर, शुक्रवार को है।
उत्पन्ना एकादशी का महत्व कई धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जल या फलाहारी व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा और ध्यान में लीन रहते हैं। पुराणों के अनुसार, इस दिन किया गया व्रत व्यक्ति के पापों को नष्ट करता है और जीवन में सुख-समृद्धि लाता है।
शुभ मुहूर्त और समय:
उत्पन्ना एकादशी के दौरान व्रत का आरंभ और समापन पंचांग के अनुसार निर्धारित होता है। 2025 में, उत्पन्ना एकादशी की तिथि 8 नवंबर, शुक्रवार है।
एकादशी प्रारंभ: 8 नवंबर, सुबह 06:12 बजे से
एकादशी समाप्ति: 9 नवंबर, सुबह 04:05 बजे तक
व्रत का समय: पूरे दिन, लेकिन विशेष रूप से प्रातःकाल और संध्या समय का महत्व अधिक है।
इस दिन व्रत करने वाले भक्त सूर्य उदय से पूर्व उठकर स्नान करते हैं और व्रत की कथा का पाठ करते हैं। घर में भगवान विष्णु का पूजन करके, तुलसी के पत्ते चढ़ाए जाते हैं और व्रत करने वाले पूरे दिन फलाहारी भोजन करते हैं।
उत्पन्ना एकादशी के विशेष योग:
इस दिन सूर्य, चंद्र और नक्षत्रों का संयोजन व्रत की सफलता में सहायक माना जाता है। पंचांग के अनुसार, उत्पन्ना एकादशी के दिन वृश्चिक नक्षत्र और विशाखा योग का योग विशेष रूप से शुभ होता है। इस दिन किये गए दान और धार्मिक कार्य व्यक्ति के भाग्य को मजबूत करते हैं और धन-सम्पदा में वृद्धि होती है।
उत्पन्ना एकादशी पर विशेष रूप से निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं:
व्रत और पूजा: निर्जल व्रत रखना या फलाहारी भोजन करना।
कथा का पाठ: उत्पन्ना एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करना।
दान और सहायता: गरीबों को अन्न, वस्त्र और धन दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
तुलसी और दीप प्रज्वलन: तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाना और उसका पूजन करना।
विशेष रूप से व्यापारियों और विद्यार्थियों के लिए यह दिन लाभकारी माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है, मानसिक शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
उत्पन्ना एकादशी का पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह मानसिक अनुशासन और आत्मसंतोष की भावना को भी बढ़ावा देता है। व्रत करने से व्यक्ति में संयम और धैर्य की वृद्धि होती है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना आसानी से कर सकता है।
इस वर्ष उत्पन्ना एकादशी को भक्ति और श्रद्धा के साथ मनाना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी रहेगा। इस दिन व्रत का पालन, कथा का श्रवण और दान-पुण्य करने से न केवल सांसारिक लाभ मिलता है, बल्कि आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
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